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स्वतंत्र सहमती किसे कहते हैं | Swatantra sahmati kise kahte hain

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Swatantra sahmati kise kahte hain

स्वतंत्र सहमती किसे कहते हैं | Swatantra sahmati kise kahte hain

Swatantra sahmati kise kahte hain

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 13 सम्मति को इस प्रकार परिभाषित करती है –

” दो या अधिक व्यक्ति सम्मत हुए तब कहे जाते हैं , जबकि वे एक ही बात पर एक ही भाव में सहमत होते हैं ”

स्वतंत्र सम्मति को धारा 14 परिभाषित करती है –

१ – प्रपीडन द्वारा

२ – असम्यक असर द्वारा

३ – कपट द्वारा

४ – दुर्व्यप्देशन द्वारा

५ – भूल द्वारा  , प्राप्त न की गयी हो .

१ –  प्रपीडन द्वारा  – प्रपीडन को अधिनियम की धारा 15 इस प्रकार परिभाषित करती है ” प्रपीडन इस आशय से की किसी व्यक्ति से कोई करार कराया जाये कोई ऐसा कार्य करना या करने के धमकी देना है , जो भारतीय दंड संहिता द्वारा निषिद्ध है अथवा किसी व्यक्ति पर चाहे वह कोई हो , प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए किसी संपत्ति का विधि विरुद्ध निरोध करना या निरोध करने की धमकी देना है. ”

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२ – असम्यक असर – असम्यक असर को भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 16 में परिभाषित किया गया है .

कोई संविदा असम्यक असर द्वारा कराई गयी तब कही जाती है जब –

a – एक पक्षकार का दुसरे पक्षकार से ऐसा सम्बन्ध हो की वह दुसरे पक्षकार की इच्छा को अधिशासित करने की इच्छा में हो .

b – उन्होंने दुसरे पक्षकार से अनुचित फायदा उठाने के लिए उस स्थिति का उपयोग किया हो

एक व्यक्ति किसी दुसरे की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में कहा जाता है जब वह ऐसे व्यक्ति के साथ संविदा करता है –

क –  जिस पर वास्तविक या दृश्यमान प्राधिकार रखता है

ख – जिसके साथ वैश्वशिक सम्बन्ध की स्थिति में है

c – लोकात्मा विरुद्ध प्रतीत होने वाली संविदा के बारे में यह साबित करने का भार की संविदा असम्यक असर द्वारा नहीं कराइ गयी थी उस व्यक्ति पर होगा जो दुसरे पक्षकार की इच्छा अधिशासित करने की स्थिति में था .

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३ – कपट द्वारा – धारा 17 भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार –

” कपट के अंतर्गत ऐसा कार्य जो संविदा के एक पक्षकार द्वारा , या उसकी मौनानुकुलता से या उसके अभिकर्ता द्वारा संविदा के किसी अन्य पक्षकार की या उसके अभिकर्ता की प्रवंचना करने के आशय से या उसे संविदा करने के लिए उत्प्रेरित करने के आशय से किया गया हो .

 

४ – दुर्व्यप्देशन  – दुर्व्यप्देशन को धारा 18 संविदा अधिनियम में परिभाषित किया गया है –

a – जब व्यक्ति दुर्व्यप्देशन करता है जो किसी बात को जाने बिना ही निश्चायक रूप में सत्य बताता है जबकि वह बात असत्य है यधपि वह उसकी सत्यता के बारे में विश्वास करता है .

b – किसी पक्षकार ने कोई कर्तव्य भंग किया हो और उस कर्तव्य भंग से उसने दुसरे पक्षकार को भुलावे में डालकर कोई लाभ प्राप्त किया हो यधपि उसने ऐसा कर्तव्य भंग बिना किसी कपटपूर्ण आशय के किया हो .

c – चाहे कितने ही सरल भाव के कारण क्यों न हो करार के किसी पक्षकार से उस पदार्थ के बारे में जो करार का विषय हो , कोई भूल कराना दुर्व्यप्देशन कहलाता है .

स्वतंत्र सहमती किसे कहते हैं

५ – भूल द्वारा – अधिनियम की धारा 20 ,21 ,22 भूल को उपबंधित करती है .

धारा 20 और 21 पारस्परिक भूल को तथा धारा 22 एक पक्षीय भूल के बारे में प्रावधान करती है . धारा 20 में तथ्य की भूल और धारा 21 विधि की भूल को बताती है , धाराएँ निम्नानुसार है –

A – जबकि दोनों पक्षकार तथ्य की भूल में हो – जहाँ की किसी करार के दोनों पक्षकार ऐसी तथ्य की बात के बारे में जो करार के लिए मर्मभुत हो , भूल में हो वहां करार शून्य है , परन्तु करार की विषयवस्तु के मूल्य के बारे में गलत राय,तथ्य की भूल नहीं समझी जाएगी . ( धारा -20 )

B – दोनों पक्षकार विधि की भूल में हो  – जहाँ की भूल भारत में प्रवृत किसी विधि के बारे में हो वहां संविदा शुन्यकरणीयं नहीं है किन्तु यदि ऐसी विधि भारत में प्रवृत नहीं है तो उसका वाही प्रभाव होगा जो तथ्य की भुल का है . ( धारा -21 )

C – जब एक पक्षकार तथ्य की भूल में हो  – जहाँ दोनों में से एक पक्षकार तथ्य की भूल में है वहां संविदा शून्यकरणीयं नहीं होगी . ( धारा -22 )

स्वतन्त्र सहमती के बिना की गयी संविदा के परिणाम

१ – यदि सम्मति प्रपीडन , कपट , दुर्व्यप्देशन के द्वारा कारीत की गयी है तो संविदा शून्यकरणीयं होगी . (धारा 19 )

२ – यदि सम्मति असम्यक असर के अधीन की गयी है तो संविदा शून्यकरणीयं होगी .(धारा 19 A)

३ – दोनों पक्षकार के द्वारा तथ्य की भूल में की गयी संविदा शून्य होगी .(धारा 20 )

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