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सर्वोच्च न्यायालय का गठन, कार्य व शक्तियाँ | Supreme court of India

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Supreme court of India

सर्वोच्च न्यायालय का गठन, कार्य व शक्तियाँ | Supreme court of India

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भारत का उच्चतम न्यायालय देश की शीर्ष अदालत है। यह भारत के संविधान के अध्याय चार के पांचवें भाग द्वारा निर्धारित संवैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना 26 जनवरी 1950 में हुई थी। 

जैसा कि भारतीय संविधान द्वारा कहा गया है, सुप्रीम कोर्ट का काम संविधान के रक्षक के तौर पर काम करना है, संघीय सरकार के प्राधिकार द्वारा स्थापित अदालत और अपील के लिए यह सबसे उपरी अदालत है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 147 भारत की सुप्रीम कोर्ट के कानूनी अधिकार और संविधान को वर्णित करते हैं।

कानूनी राहत के मामले में भारत की सुप्रीम कोर्ट अपील के लिए सबसे उपरी अदालत और अंतिम विकल्प है जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के हाई कोर्ट के फैसलों के विरोध में अपील को सुनता है।

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उच्चतम न्यायालय का गठन

28 जनवरी 1950, भारत के एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के दो दिन बाद, भारत का उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया।

उद्घाटन समारोह का आयोजन संसद भवन के नरेंद्रमण्डल(चेंबर ऑफ़ प्रिंसेज़) भवन में किया गया था।

इससे पहले सन् १९३७ से १९५० तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत की संघीय अदालत का भवन था।

आज़ादी के बाद भी सन् १९५८ तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था, जब तक कि 1958 में उच्चतम न्यायालय ने अपने वर्तमान तिलक मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर का अधिग्रहण किया।

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उच्चतम न्यायालय परिसर

उच्चतम न्यायालय भवन के मुख्य ब्लॉक को भारत की राजधानी नई दिल्ली में तिलक रोड स्थित 22 एकड़ जमीन के एक वर्गाकार भूखंड पर बनाया गया है।

निर्माण का डिजाइन केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के प्रथम भारतीय अध्यक्ष मुख्य वास्तुकार गणेश भीकाजी देवलालीकर द्वारा इंडो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में बनाया गया था।

न्यायालय 1958 में वर्तमान इमारत में स्थानान्तरित किया गया। भवन को न्याय के तराजू की छवि देने की वास्तुकारों की कोशिश के अंतर्गत भवन के केन्द्रीय ब्लाक को इस तरह बनाया गया है की वह तराजू के केन्द्रीय बीम की तरह लगे।

1979 में दो नए हिस्से पूर्व विंग और पश्चिम विंग को १९५८ में बने परिसर में जोड़ा गया। कुल मिलकर इस परिसर में १५ अदालती कमरे हैं।

मुख्य न्यायाधीश की अदालत, जो कि ने केन्द्रीय विंग के केंद्र में स्थित है सबसे बड़ा अदालती कार्यवाही का कमरा है। इसमें एक ऊंची छत के साथ एक बड़ा गुंबद भी है।

 

उच्चतम न्यायालय की संरचना

भारत के संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय के लिए मूल रूप से दी गयी व्यवस्था में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों को अधिनियमित किया गया था और इस संख्या को बढ़ाने का जिम्मा संसद पर छोड़ा गया था।

प्रारंभिक वर्षों में, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ एक साथ बैठा करती थी।

जैसे जैसे न्यायालय के कार्य में वृद्धि हुई और लंबित मामले बढ़ने लगे, भारतीय संसद द्वारा न्यायाधीशों की मूल संख्या को आठ से बढ़ाकर १९५६ में ग्यारह, 1960 में चौदह, 1978 में अठारह, 1986 में छब्बीस और 2008 में इकत्तीस तक कर दिया गया।

न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है, वर्तमान में वे दो या तीन की छोटी न्यायपीठों (जिन्हें ‘खंडपीठ’ कहा जाता है) के रूप में सुनवाई करते हैं।

संवैधानिक मामले और ऐसे मामले जिनमें विधि के मौलिक प्रश्नों की व्याख्या देनी हो, की सुनवाई पांच या इससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ (जिसे ‘संवैधानिक पीठ’ कहा जाता है) द्वारा की जाती है।

कोई भी पीठ किसी भी विचाराधीन मामले को आवश्यकता पड़ने पर संख्या में बड़ी पीठ के पास सुनवाई के लिए भेज सकती है।

 


 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय से सम्बंधित अनुछेद है .जिनमे से कुछ प्रमुख अनुछेद की जानकारी आपको नीचे दी जा रही है 

उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन

अनुछेद 124 – 

(1) भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो भारत के मुख्य न्यायमूार्ति और, जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है तब तक, सात से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा ।

(2) उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात् , जिनसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए परामर्श करना आवश्यक समझे, राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र   द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा और वह न्यायाधीश तब तक पद धारण करेगा जब तक वह फैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता है :

परन्तु मुख्य न्यायमूार्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में भारत के मुख्य न्यायमूार्ति से सदैव परामर्श  किया जाएगा :

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परन्तु यह और कि —

(क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ;

(ख) किसी न्यायाधीश को खंड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा ।

[(2क) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से अवधारित की जाएगी   जिसका संसद विधि द्वारा उपबंध करे ।]

(3) कोई व्यक्ति, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक है और–

(क) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम पांच वर्ष तक न्यायाधीश रहा है ; या

(ख) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवकक़्ता रहा है ; या

(ग) राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता है ।

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स्पष्टीकरण 1–इस खंड में, “उच्च न्यायालय”से वह उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जो भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में अधिकारिता का प्रयोग करता है, या इस संविधान के प्रारंभ से पहले किसी भी समय प्रयोग करता था ।

स्पष्टीकरण 2–इस खंड के प्रयोजन के लिए , किसी व्यक्ति के अधिवकक़्ता रहने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी साम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अधिवकक़्ता होने के पश्चात् ऐसा न्यायिक पद  धारण किया है जो जिला न्यायाधीश के पद से अवर नहीं है ।

(4) उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समार्थित समावेदन, राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्ट्रपति ने आदेश नहीं दे दिया है ।

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(5) संसद खंड (4) के अधीन किसी समावेदन के रखे जाने की तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण और साबित करने की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकेगी ।

(6) उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पद ग्रहण करने के पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्ति व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप  केअनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

(7) कोई व्यक्ति , जिसने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा ।

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न्यायाधीशों के वेतन

अनुछेद 125 – 

[(1) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को ऐसे वेतनों का संदाय किया जाएगा जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे   वेतनों का संदाय किया जाएगा जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं । ]

(2) प्रत्येक न्यायाधीश ऐसे विशेषाधिकारों और भत्तों का तथा अनुपस्थिति छुट्टी और पेंशन के संबंध में ऐसे अधिकारों का, जो संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन समय-समय पर अवधारित किए जाएं और जब तक इस प्रकार अवधारित नहीं किए जाते हैं तब तक ऐसे विशेषाधिकारों, भत्तों और अधिकारों का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट  हैं, हकदार होगा :

परन्तु किसी न्यायाधीश के विशेषाधिकारों और भत्तों में तथा अनुपस्थिति छुट्टी या पेंशन के संबंध में उसके अधिकारों में उसकी नियुक्ति  के पश्चात् उसके लिए  अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

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कार्यकारी मुख्य न्यायमूार्ति की नियुक्ति

अनुछेद 126 –

जब भारत के मुख्य न्यायमूार्ति का पद रिक्त है या जब मुख्य न्यायमूार्ति, अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों में से ऐसा एक न्यायाधीश, जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों  का पालन करेगा ।

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तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति

अनुछेद 127 –

(1) यदि किसी समय उच्चतम न्यायालय के सत्र को आयोजित करने या चालू रखने के लिए उस न्यायालय के न्यायाधीशों की गणपूर्ति प्राप्त न हो तो भारत का मुख्य न्यायमूार्ति राष्ट्रपति की पूर्व  सहमति से और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूार्ति से परामर्श करने के पश्चात् , किसी उच्च न्यायालय के किसी ऐसे न्यायाधीश से, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित है और जिसे भारत का मुख्य न्यायमूार्ति नामोदिष्ट करे, न्यायालय की बैठकों में उतनी अवधि के लिए, जितनी आवश्यक हो, तदर्थ न्यायाधीश के रूप में उपस्थित रहने के लिए लिखित रूप में अनुरोध कर सकेगा ।

(2) इस प्रकार नामोदिष्ट न्यायाधीश का कर्तव्य होगा कि वह अपने पद के अन्य कर्तव्यों पर पूर्विकता देकर उस समय और उस अवधि के लिए, जिसके लिए उसकी उपस्थिति अपेक्षित है, उच्चतम न्यायालय की बैठकों में, उपस्थित हो और जब वह इस प्रकार उपस्थित होता है तब उसको उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सभी अधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार होंगे और वह उक्त न्यायाधीश के कर्तव्यों का निर्वहन करेगा ।

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उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवॄत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति

अनुछेद 128 –

इस अध्याय में किसी बात के होते हुए  भी, भारत का मुख्य न्यायमूार्ति, किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से किसी व्यक्ति से, जो उच्चतम न्यायालय या फेडरल न्यायालय के न्यायाधीश का पद धारण कर चुका है [52][या जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का पद  धारण कर चुका है और उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित है,] उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध कर सकेगा और प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जिससे इस प्रकार अनुरोध किया जाता है, इस प्रकार बैठने और कार्य करने के दौरान, ऐसे भत्तों का हकदार होगा जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे और उसको उस न्यायालय के न्यायाधीश की सभी अधिकारिता, शक्ति यां और विशेषाधिकार होंगे, किन्तु उसे अन्यथा उस न्यायालय का न्यायाधीश नहीं समझा जाएगा   :

परन्तु जब तक यथापूर्वोक्त व्यक्ति उस न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने की सहमति नहीं दे देता है तब तक इस अनुच्छेद की कोई बात उससे ऐसा करने की अपेक्षा करने वाली नहीं समझी जाएगी ।

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उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना

अनुछेद 129 –

उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।

 

उच्चतम न्यायालय का स्थान

अनुछेद 130 –

उच्चतम न्यायालय दिल्ली में अथवा ऐसे अन्य स्थान या स्थानों में अधिविष्ट होगा जिन्हें भारत का मुख्य न्यायमूार्ति, राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय-समय पर, नियत करे ।

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उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता

अनुछेद 131 –

इस संविधान के उपबंधों  के अधीन रहते हुए,–

(क) भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या

(ख) एक  ओर भारत सरकार और किसी राज्य या राज्यों और दूसरी ओर एक  या अधिक अन्य राज्यों के बीच, या

(ग) दो या अधिक राज्यों के बीच,

किसी विवाद में, यदि और जहां तक उस विवाद में (विधि का या तथ्य का) ऐसा  कोई प्रश्न अंतर्वलित है जिस पर  किसी विधिक अधिकार का आस्तित्व या विस्तार निर्भर है तो और वहां तक अन्य न्यायालयों का अपवर्जन  करके उच्चतम न्यायालय को आरंभिक अधिकारिता होगी :

[ परन्तु उक्त अधिकारिता का विस्तार उस विवाद पर नहीं होगा जो किसी ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबंध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत से उत्फन्न हुआ है जो इस संविधान के प्रारंभ से पहले  की गई थी या निष्पादित की गई थी और ऐसे प्रारंभ के पश्चात् प्रवर्तन में है या जो यह उपबंध करती है कि उक्त अधिकारिता का विस्तार ऐसे विवाद पर नहीं   होगा ।]

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कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

अनुछेद 132 –

(1) भारत के राज्यक्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय की सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री  या अंतिम आदेश की अपील  उच्चतम न्यायालय में होगी [55][यदि वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है] कि उस मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है ।

(3) जहां ऐसा प्रमाणपत्र दे दिया गया है [57]* * * वहां उस मामले में कोई फक्षकार इस आधार पर उच्चतम न्यायालय में अपील  कर सकेगा कि पूर्वोक्त  किसी प्रश्न का विनिश्चय गलत किया गया है 5* * * ।

स्पष्टीकरण–इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए , “अंतिम आदेश”पद के अंतर्गत ऐसे विवाद्यक का विनिश्चय करने वाला आदेश है जो, यदि अपीलार्थी के पक्ष में विनिाश्चित किया जाता है तो, उस मामले के अंतिम निपटारे के लिए  पर्याप्त होगा ।

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उच्च न्यायालयों से सिविल विषयों से संबंधित अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

अनुछेद 133 –

[(1) भारत के राज्यक्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय की सिविल कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील  उच्चतम न्यायालय में होगी [59][यदि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है कि]–

(क) उस मामले में विधि का व्यापक महत्व का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है ; और

(ख) उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का उच्चतम न्यायालय द्वारा विनिश्चय आवश्यक है ।]

(2) अनुच्छेद 132 में किसी बात के होते हुए  भी, उच्चतम न्यायालय में खंड (1) के अधीन अपील  करने वाला कोई पक्षकार ऐसी अपील के आधारों में यह आधार भी बता सकेगा कि इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि के किसी सारवान् प्रश्न का विनिश्चय गलत किया गया है ।

(3) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए  भी, उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील उच्चतम न्यायालय में तब तक नहीं होगी जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे ।

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दांडिक विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता

अनुछेद 134 –

(1) भारत के राज्यक्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील उच्चतम न्यायालय में होगी यदि–

(क) उस उच्च न्यायालय ने अपील में किसी अभियुकक़्त व्यक्ति की दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या

(ख) उस उच्च न्यायालय ने अपने प्राधिकार के अधीनस्थ किसी न्यायालय से किसी मामले को विचारण के लिए अपने  पास मंगा लिया है और ऐसे विचारण में अभियुकक़्त व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या (ग) वह उच्च न्यायालय [60][अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है] कि मामला उच्चतम न्यायालय में अपील किए जाने योग्य है :

(2) संसद विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय को भारत के राज्यक्षेत्र में किसी उच्चन्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए

गए  किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील ऐसी शर्तों और फरिसीमाओं के अधीन रहते हुए , जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट  की जाएं, ग्रहण करने और सुनने की अतिरिक्त शक्ति दे सकेगी ।

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[134क. उच्चतम न्यायालय में अपील  के लिए  प्रमाणपत्र  –प्रत्येक उच्च न्यायालय, जो अनुच्छेद 132 के खंड (1) या अनुच्छेद 133 के खंड (1) या अनुच्छेद 134 के खंड (1) में निर्दिष्ट  निर्णय, डिक्री, अंतिम आदेश या दंडादेश पारित  करता है या देता है, इस प्रकार पारित किए जाने या दिए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, इस प्रश्न का अवधारण कि उस मामले के संबंध में, यथास्थिति, अनुच्छेद 132 के खंड (1) या अनुच्छेद 133 के खंड (1) या अनुच्छेद 134 के खंड (1) के उपखंड (ग) में निर्दिष्ट प्रकॄति का प्रमाणपत्र दिया जाएं या नहीं  ,–

(क) यदि वह ऐसा करना ठीक समझता है तो स्वप्रेरणा से कर सकेगा ; और

(ख) यदि ऐसा निर्णय, डिक्री , अंतिम आदेश या दंडादेश पारित  किए  जाने या दिए  जाने के ठीक पश्चात्  एयथित फक्षकार द्वारा या उसकी ओर से मौखिक आवेदन किया जाता है तो करेगा।]

 

विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होना

अनुछेद 135 –

जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तबतक उच्चतम न्यायालय को भी किसी ऐसे   विषयके संबंध में, जिसको अनुच्छेद 133 या अनुच्छेद 134 के उपबंध लागू नहीं होते हैं, अधिकारिता और शक्ति यां होंगी यदि उस विषयके संबंध में इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले किसी विद्यमान विधि के अधीन अधिकारिता और शक्तियां फेडरल न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य थीं   ।

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अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत

अनुछेद 136 – 

(1) इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, उच्चतम न्यायालय अपने विवेकानुसार भारत के राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा किसी वाद या मामले में पारित किए गए या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री , अवधारण, दंडादेश या आदेश की अपील  के लिए विशेष इजाजत दे सकेगा ।

(2) खंड (1) की कोई बात सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा पारित किए गए या दिए गए किसी निर्णय, अवधारण, दंडादेश या आदेश को लागू नहीं होगी ।

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निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालयों द्वारा पुनार्विलोकन

अनुछेद 137 –

संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाएं गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाएं गए निर्णय या दिए गए आदेश का पुनार्विलोकन करने की शक्ति होगी ।

 

उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वॄद्धि

अनुछेद 138 –

(1) उच्चतम न्यायालय को संघ सूची के विषयों में से किसी के संबंध में ऐसी अतिरिक्त अधिकारिता और शक्तियां होंगी जो संसद विधि द्वारा प्रदान करे ।

(2) यदि संसद विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसी अधिकारिता और शक्तियों के प्रयोग का उपबंध करती है तो उच्चतम न्यायालय को किसी विषय के संबंध में ऐसी अतिरिक्त अधिकारिता और शक्ति यां होंगी जो भारत सरकार और किसी राज्य की सरकार विशेष करार द्वारा प्रदान करे ।

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कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना

अनुछेद 139 –

संसद विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के खंड (2) में वार्णित प्रयोजनों से भिन्न किन्हीं प्रयोजनों के लिए ऐसे निदेश, आदेश या रिट, जिनके अंतर्गतबंदी प्रत्यक्षीकरण, पर मादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, या उनमें से कोई निकालने की शक्ति प्रदान कर सकेगी ।

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कुछ मामलों का अंतरण

अनुछेद 139क –

[(1) यदि ऐसे मामले, जिनमें विधि के समान या सारतः समान प्रश्न अंतर्वलित हैं, उच्चतम न्यायालय के और एक या अधिक उच्च न्यायालयों के अथवा दो या अधिक उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित हैं और उच्चतम न्यायालय का स्वप्रेरणा से अथवा भारत के महान्यायवादी द्वारा या ऐसे किसी मामले के किसी पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर यह समाधान हो जाता है कि ऐसे प्रश्न व्याफक महत्व के सारवान् प्रश्न हैं तो, उच्चतम न्यायालय उस उच्च न्यायालय या उन उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित मामले या मामलों को अपने  पास मंगा सकेगा और उन सभी मामलों को स्वंय निपटा सकेगा :

परन्तु उच्चतम न्यायालय इस प्रकार मंगाए गए मामले को उक्त विधि के प्रश्नों का अवधारण करने के पश्चात् ऐसे   प्रश्नों पर अपने निर्णय की प्रतिलिपि सहित उस उच्च न्यायालय को, जिससे मामला मंगा लिया गया है, लौटा सकेगा और वह उच्च न्यायालय उसके प्राप्त होने पर उस मामले को ऐसे निर्णय के अनुरूप निफटाने के लिए आगे कार्यवाही करेगा । ]

(2) यदि उच्चतम न्यायालय न्याय के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसा करना समीचीन समझता है तो वह किसी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले, अपील  या अन्य कार्यवाहीका अंतरण किसी अन्य उच्च न्यायालय को कर सकेगा।]

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उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियां

अनुछेद 140 –

संसद, विधि द्वारा, उच्चतम न्यायालय को ऐसी अनुपूरक शक्तियां प्रदान करने के लिए उपबंध कर सकेगी जो इस संविधान के उपबंधों में से किसी से असंगत न हों और जो उस न्यायालय को इस संविधान द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त अधिकारिता का अधिक प्रभावी रूप से प्रयोग करने के योग्य बनाने के लिए आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हों ।

 

उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होना

अनुछेद 141 –

उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी ।

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उच्चतम न्यायालय की डिक्रीयों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश

अनुछेद 142 –

(1) उच्चतम न्यायालय अपनी  अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित  कर सकेगा या ऐसा आदेश कर सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो और इस प्रकार पारित डिक्री या किया गया आदेश भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र ऐसी रीति से, जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाएं, और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक, ऐसी रीति से जो राष्ट्रपति आदेश[64] द्वारा विहित करे, प्रवर्तनीय होगा ।

(2) संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों  के अधीन रहते हुए , उच्चतम न्यायालयको भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाजिर कराने के, किन्हीं दस्तावेजों के प्रकटीकरण या पेश कराने के अथवा अपने किसी अवमान का अन्वेषण करने या दंड देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त और प्रत्येक शक्ति होगी ।

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उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुछेद 143 –

(1) यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकॄति का और ऐसे   व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा ।

(2) राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 [65]* * * के परन्तुक में किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार के विवाद को, जो [66][उक्त   परन्तुक ] में वार्णित है, राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और उच्चतम न्यायालय, ऐसी  सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा ।

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सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य किया जाना

अनुछेद 144 –

भारत के राज्यक्षेत्र के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे ।

 

न्यायालय के नियम आदि

अनुछेद 145 –

(1) संसद  द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय समय-समय पर, राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के, साधारणतया, विनियमन के लिए  नियम बना सकेगा जिसके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात्  :–

(क) उस न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के बारे में नियम ;

(ख) अपीलें सुनने के लिए प्रक्रिया के बारे में और अपीलों संबंधी अन्य विषयों के बारे में, जिनके अंतर्गत वह समय भी है

जिसके भीतर अफीलें उस न्यायालय में ग्रहण की जानी हैं, नियम ;

(ग) भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी का प्रवर्तन कराने के लिए उस न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में नियम ;

[68][(गग) [69][अनुच्छेद 139कटके अधीन उस न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में नियम ;]

(घ) अनुच्छेद 134 के खंड (1) के उपखंड (ग) के अधीन अपीलों को ग्रहण किए जाने के बारे में नियम ;

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(ङ) उस न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या किए गए आदेश का जिन शर्तों के अधीन रहते हुए पुनार्विलोकन किया जा सकेगा उनके बारे में और ऐसे पुनर्विलोकन के लिए प्रक्रिया के बारे में, जिसके अतंर्गत वह समय भी है जिसके भीतर ऐसे पुनर्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं, नियम ;

(च) उस न्यायालय में किन्हीं  कार्यवाहियों के और उनके आनुषंगिक  खर्चे के बारे में, तथा उसमें कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में नियम ;

(छ) जमानत मंजूर करने के बारे में नियम ;

(ज) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में नियम ;

(झ) जिस अपील  के बारे में उस न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह तुच्छ या तंग करने वाली है अथवा विलंब करने के प्रयोजन से की गई है, उसके संक्षिप्त अवधारण के लिए उपबंध करने वाले नियम ;

(ञ) अनुच्छेद 317 के खंड (1) में निर्दिष्ट  जांचों के लिए  प्रक्रिया  के बारे में नियम ।

(2) [70][[71]* * * खंड (3) के उपबंधों ] के अधीन रहते हुए, इस अनुच्छेद के अधीन बनाएं गए नियम, उन न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या नियत कर सकेंगे जो किसी प्रयोजन के लिए बैठेंगे तथा एक ल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शक्ति के लिए उपबंध कर सकेंगे ।

Supreme court of India

(3) जिस मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अतंर्वलितहै उसका विनिश्चय करने के प्रयोजन के लिए  या इस संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन निर्देश की सुनवाई करने के प्रयोजन के लिए  बैठने वाले न्यायाधीशों की [72][2* * * न्यूनतम संख्या ] पांच होगी :

परन्तु जहां अनुच्छेद 132 से भिन्न इस अध्याय के उपबंधों के अधीन अपील की सुनवाई करने वाला न्यायालय पांच  से कम न्यायाधीशों से मिलकर बना है और अपील की सुनवाई के दौरान उस न्यायालय का समाधान हो जाता है कि अपील में संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का ऐसा सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है जिसका अवधारण अपील के निपटारे के लिए आवश्यक है वहां वह न्यायालय ऐसे प्रश्न को उस न्यायालय को, जो ऐसे प्रश्न को अंतर्वलित करने वाले किसी मामले के विनिश्चय के लिए इस खंड की अपेक्षानुसार गठित किया जाता है, उसकी राय केलिए  निर्देशित करेगा और ऐसी राय की प्राप्ति पर उस अपील को उस राय के अनुरूप निफटाएगा ।

(4) उच्चतम न्यायालय प्रत्येक निर्णय खुले न्यायालय में ही सुनाएगा, अन्यथा नहीं और अनुच्छेद 143 के अधीन प्रत्येक प्रतिवेदन खुले न्यायालय में सुनाई गई राय के अनुसार ही दिया जाएगा, अन्यथा नहीं   ।

(5) उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रत्येक निर्णय और ऐसी प्रत्येक राय, मामले की सुनवाई में उपस्थित न्यायाधीशों की बहुसंख्या की सहमति से ही दी जाएगी, अन्यथा नहीं, किन्तु इस खंड की कोई बात किसी ऐसे न्यायाधीश को, जो सहमत नहीं है, अपना विसम्मत निर्णय या राय देने से निवारित नहीं करेगी ।

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उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय

अनुछेद 146 –

(1) उच्चतम न्यायालय केअधिकारियों और सेवकों की नियुक्तियां भारत का मुख्य न्यायमूार्ति करेगा या उस न्यायालय का ऐसा अन्य न्यायाधीश या अधिकारी करेगा जिसे वह निदिष्ट करे :

परन्तु राष्ट्रपति नियम द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी किन्हीं दशाओं में, जो नियम में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले से ही न्यायालय से संलग्न नहीं है, न्यायालय से संबंधित किसी पद पर संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श करके ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(2) संसद द्वारा बनाई गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो भारत के मुख्य न्यायमूार्ति या उस न्यायालय के ऐसे अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा, जिसे भारत के मुख्य न्यायमूार्ति ने इस प्रयोजन के लिए  नियम बनाने के लिए प्राधिकॄत किया है, बनाएं गए नियमों द्वारा विहित की जाएं  :

परन्तु इस खंड के अधीन बनाएं गए  नियमों के लिए , जहां तक वे वेतनों, भत्तों, छुट्टी या पेंशनों से संबंधित हैं, राष्ट्रपति के अनुमोदन की अपेक्षा  होगी ।

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(3) उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक व्यय, जिनके अतंर्गत उस न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों को या उनके संबंध में संदेय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होंगे और उस न्यायालय द्वारा ली गई फीसें और अन्य धनराशियां उस निधि का भाग होंगी ।


सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सूची

अनुक्रमांक न्यायाधीश का नाम कार्यकाल
1एच जे कनिया26 जनवरी 1950 से 06 नवम्बर 1951 तक
2एम. पी. शास्त्री07 नवम्बर 1951 से 03 जनवरी 1954 तक
3मेहरचंद महाजन 04 जनवरी 1954 से 22 दिसम्बर 1954 तक
4बी. के. मुखरीजा 23 दिसम्बर 1954 से 31 जनवरी 1956 तक
5एस. आर. दास01 फरवरी 1956 से 30 सितम्बर 1959 तक
6बी. पी. सिन्हा01 अक्टूबर 1959 से 31 जनवरी 1964 तक
7पी. बी. गजेन्द्र गढ़कर01 फरवरी 1964 से 15 मार्च 1966 तक
8ए. के. सरकार16 मार्च 1966 से 29 जून 1966 तक
9के. एस. राव 30 जून 1966 से 11 अप्रैल 1967 तक
10के. एन. वान्चू12 अप्रैल 1967 से 24 फरवरी 1968 तक
11एम. हिदायतुल्ला25 फरवरी 1968 से 16 दिसम्बर 1970 तक
12जे. सी. शाह17 दिसम्बर 1970 से 21 जनवरी 1971 तक
13एस. एम. सिकरी22 जनवरी 1971 से 25 अप्रैल 1973 तक
14ए. एन. रे26 अप्रैल 1973 से 27 जनवरी 1977 तक
15मिर्जा हमीदुल्ला बेग28 जनवरी 1977 से 21 फरवरी 1978 तक
16वाई. वी. चंद्रचूड़22 फरवरी 1978 से 11 जुलाई 1985 तक
17पी. एन. भगवती12 जुलाई 1985 से 20 दिसम्बर 1986 तक
18आर. एस. पाठक21 दिसम्बर 1986 से 18 जून 1989 तक
19ई. एस. वेंकटरमैय्या19 जून 1989 से 17 दिसम्बर 1989 तक
20एस. मुखर्जी18 दिसम्बर 1989 से 25 सितम्बर 1990 तक
21रंगनाथ मिश्र26 सितम्बर 1990 से 24 नवम्बर 1991 तक
22के. एन. सिंह25 नवम्बर 1991 से 12 दिसम्बर 1991 तक
23एम. एच. कनिया13 दिसम्बर 1991 से 17 नवम्बर 1992 तक
24एल. एम. शर्मा18 नवम्बर 1992 से 11 फरवरी 1993 तक
25एम. एन. वेंकटचेलैय्या12 फरवरी 1993 से 24 अक्टूबर 1994 तक
26ए. एम. अहमदी25 अक्टूबर 1994 से 24 मार्च 1997 तक
27जे. एस. वर्मा25 मार्च 1997 से 17 जनवरी 1998 तक
28एम. एम. पुंछी18 जनवरी 1998 से 09 अक्टूबर 1998 तक
29ए. एस. आनंद10 अक्टूबर 1998 से 11 जनवरी 2001 तक
30एस. पी. भरुचा11 जनवरी 2001 से 06 मई 2002 तक
31बी. एन. कृपाल06 मई 2002 से 08 नवम्बर 2002 तक
32जी. बी. पटनायक08 नवम्बर 2002 से 19 दिसम्बर 2002 तक
33वी. एन. खरे 19 2002 से 02 मई 2004 तक
34राजेन्द्र बाबू 02 मई 2004 से 01 जून 2004 तक
35आर. सी. लहोटी 01 जून 2004 से 01 नवम्बर 2005 तक
36वाई. के. सभरवाल01 नवम्बर 2005 से 13 जनवरी 2007 तक
37के. जी. बालकृष्णन13 जनवरी 2007 से 11 मई 2010 तक
38एस. एच. कापड़िया12 मई 2010 से 28 2012 तक
39अल्तमास कबीर29 सितम्बर 2012 से 18 जुलाई 2013 तक
40पी. सतशिवम19 जुलाई 2013 से 26 अप्रैल 2014 तक
41राजेन्द्र मल लोढ़ा26 अप्रैल 2014 से 27 सितम्बर 2014 तक
42एच. एल. दत्तु 28 सितम्बर 2014 से 02 दिसम्बर 2015 तक
43तीरथ सिंह ठाकुर03 दिसम्बर 2015 से 03 जनवरी 2017 तक
44जगदीश सिंह खेहर04 जनवरी 2017 से 27 अगस्त 2017 तक
45दीपक मिश्रा28 अगस्त 2017 से 02 अक्टूबर 2018 तक
46रंजन गोगोई03 अक्टूबर 2018 से 17 नवम्बर 2019 तक


उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन सम्बन्धी अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिये .


 

 

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