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प्रथम सुचना रिपोर्ट | FIR kya hai

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FIR Kya Hai

प्रथम सुचना रिपोर्ट | FIR Kya Hai

Fir kya hai

आज के इस आर्टिकल में मै आपको प्रथम सुचना रिपोर्ट ( FIR ) के विषय में बताने का प्रयास कर रहा हूँ . कानून से सम्बंधित प्रत्येक प्रतियोगिता परीक्षा में FIR के बारे में अधिकतर पूछा जाता है . खास तौर वे सभी व्यक्ति जो पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहे हैं या पुलिस में भर्ती होने वाले हैं उनके लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी है . इस आर्टिकल में आप जानेंगे कि –

१ – FIR क्या होती है ?

२ – किस तरह के अपराध के लिए FIR की जा सकती है ?

३ – FIR कौन लिखवा सकता है ?

४ – aFIR कब किया जाता है ?

५ – FIR कहाँ दर्ज कराया जा सकता है ?

६ – FIR कराते समय आपके अधिकार ?

Fir kya hai

FIR क्या होती है 

FIR को हिंदी में प्रथम सुचना रिपोर्ट (First information Report ) कहा जाता है . जब हम किसी गंभीर अपराध की जानकारी पुलिस को देते हैं या पुलिस को रिपोर्ट लिखवाते हैं, तो उसे FIR कहा जाता है.

वैसे तो दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में प्रथम सुचना रिपोर्ट (FIR ) को कंही भी परिभाषित नहीं किया गया है . लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 में संज्ञेय मामलो में इत्तिला और धारा 155 में असंज्ञेय मामलो में इत्तिला को परिभाषित किया गया है .

संज्ञेय मामलो में इत्तिला

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 के अनुसार –

(1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या उसके निदेशाधीन लेखबद्ध कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी इतिला पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे जो उसे दे और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी जिसे राज्य सरकार इस निमित विहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन अभिलिखित इतिला की प्रतिलिपि, इतिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।

(3) कोई व्यक्ति जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के उपधारा (1) में निर्दिष्ट इतिला को अभिलिखित करने से इंकार करने से व्यथित है, ऐसी इतिला का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है जो, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी इतिला से किसी संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो, या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस संहिता द्वारा उपबंधित रीति से अन्वेषण किए जाने का निदेश देगा और उस अधिकारी को उस अपराध के संबंध में पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी की सभी शक्तियां होंगी।

Fir kya hai

असंज्ञेय मामलो में इत्तिला

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 155 के अनुसार –

१ – जब पुलिस अधिकारी के भारसाधक अधिकारी को उस थाने की सीमाओं के अन्दर असंज्ञेय अपराध के किये जाने की इत्तिला दी जाती है ,तब वह ऐसी इत्तिला का सार , ऐसी पुस्तक में , जो ऐसे अधिकारी द्वारा ऐसे प्ररूप में रखी जाएगी , जो राज्य सरकार इस निम्मित विहित करे , प्रविष्ठी करेगा या प्रविष्ठी कराएगा और इत्तिला देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास जाने को निर्देशित करेगा .

२ – कोई पुलिस अधिकारी किसी असंज्ञेय मामले का अन्वेषण ऐसे मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना नहीं करेगा जिसे ऐसे मामले का विचारण करने की या मामले को विचारणार्थ सुपुर्द करने की शक्ति है .

३ – कोई पुलिस अधिकारी ऐसा आदेश मिलने पर (वारेंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति के सिवाय ) अन्वेषण के बारे में वैसी ही शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जैसी पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी संज्ञेय मामले में कर सकता है .

४ – जहाँ मामले का सम्बन्ध ऐसे दो या अधिक अपराधो से है , जिनमे से कम से कम एक संज्ञेय है , वहां इस बात के होते हुए भी की अन्य अपराध असंज्ञेय है , वह मामला संज्ञेय मामला समझा जायेगा .

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किस तरह के अपराध के लिए FIR की जा सकती है 

पुलिस ऐसे अपराधो के लिए प्रथम सुचना रिपोर्ट ( FIR ) दर्ज करती है , जो प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं  , संज्ञेय अपराध की परिभाषा दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा २(ग) में दी गयी है जो इस प्रकार है –

“संज्ञेय अपराध ” से ऐसा अपराध अभिप्रेत है , जिसके लिए और ” संज्ञेय मामला ” से ऐसा मामला अभिप्रेत है , जिसमें पुलिस अधिकारी पहली अनुसूची के या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के अनुसार , वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है।

Aसंज्ञेय अपराध को सरल भाषा में जानिए –

  • संज्ञेय अपराध का मतलब वह अपराध है जिसके लिए, और ‘संज्ञेय मामले’ का मतलब ऐसा मामला, जिसमें एक पुलिस अधिकारी पहली अनुसूची के अनुसार या किसी अन्य लागू कानून के तहत, बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है।
  • संज्ञेय अपराध वे अपराध हैं जो प्रकृति में गंभीर हैं। उदाहरण – हत्या, बलात्कार, दहेज मौत, अपहरण, चोरी, विश्वास का आपराधिक हनन, अप्राकृतिक अपराध
  • सीआरपीसी की धारा 154, संज्ञेय अपराध या मामले के तहत, पुलिस अधिकारी को संज्ञेय अपराध से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) (जो मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना हो सकता है) प्राप्त कर, और इसे सामान्य डायरी में दर्ज कर तुरंत जांच शुरू करें।
  • यदि एक संज्ञेय अपराध किया गया है, तो पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच कर सकता है।

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असंज्ञेय अपराध की परिभाषा दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा २(ठ) में दी गयी है जो इस प्रकार है –

” असंज्ञेय अपराध ” से ऐसा अपराध अभिप्रेत हा , जिसके लिए और ” असंज्ञेय मामला ” से ऐसा मामला अभिप्रेत है , जिसमे पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं होता है .

aअसंज्ञेय अपराध को सरल भाषा में जानिए –

  • एक गैर-संज्ञेय अपराध को आपराधिक प्रक्रिया संहिता में निम्नानुसार परिभाषित किया गया है, “गैर-संज्ञेय अपराध” का अर्थ है एक अपराध जिसके लिए, और `गैर-संज्ञेय मामले’ का अर्थ है जिसमें एक पुलिस अधिकारी को बिना वारंट के गिरफ्तारी करने का कोई अधिकार नहीं है।”
  • गैर-संज्ञेय अपराध वे हैं जो प्रकृति में अधिक गंभीर नहीं होते। उदाहरण – आक्रमण, धोखाधड़ी, जालसाज़ी, मानहानि।
  • सीआरपीसी की धारा 155 यह बताता है कि गैर-संज्ञेय अपराध या मामले में, पुलिस अधिकारी तब तक एफआईआर प्राप्त या रिकॉर्ड नहीं कर सकता जब तक कि वह मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति प्राप्त न करे।
  • एक गैर-संज्ञेय अपराध / मामले के तहत, जांच शुरू करने के लिए, पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।

Fir kya hai

FIR कौन लिखता है 

प्रथम सुचना रिपोर्ट (FIR) वह व्यक्ति लिखवा सकता है , जो किसी अपराध का शिकार हुआ हो या वह व्यक्ति जिसने अपराध को घटित होते हुए देखा हो या वह व्यक्ति जिसे उस अपराध के विषय में जानकारी हो .

FIR कब दर्ज कराया जाता है 

प्रथम सुचना रिपोर्ट (FIR) घटना या अपराध के तुरंत बाद दर्ज करवानी चाहिए यदि FIR दर्ज कराने में देरी की जाती है तो आपको सटीक स्पष्टीकरण भी देना होता है , कई बार FIR लिखवाने में देरी हो जाने पर आप शक के दायरे में आ जाते हैं , इसीलिए अपराध या घटना के घटित होने के तुरंत बाद FIR लिखवाई जानी चाहिए  .

FIR कहाँ दर्ज कराया जा सकता है 

सामान्यतः प्रथम सुचना रिपोर्ट ( FIR ) अपराध या घटना घटित होने के दायरे में आने वाले थाने में लिखवाई जा सकती है , लेकिन आपातकाल या इमरजेंसी की स्थिति में किसी भी नजदीकी पुलिस स्टेशन में लिखवाई जा सकती है , उसके बाद उस थाने के थानाधिकारी उसे सम्बंधित पुलिस स्टेशन में कार्यवाही हेतु भेज सकते हैं .

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FIR कराते समय आपके अधिकार

1- किसी भी मामले में तुरंत FIR दर्ज करना यह जरूरी होता है FIR करने के बाद उस की कॉपी लेना आपका अधिकार है इसके लिए कोई भी पुलिस अधिकारी मना नहीं कर सकता और मना करता है. तो उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं.

2 -किसी अपराध के बारे में FIR में लिखे गए गए घटनाक्रम और दूसरी जानकारियों को शिकायतकर्ता को पढ़कर सुनाना जरूरी होता है अगर आप उससे सहमत है. तो आप उसके ऊपर हस्ताक्षर करें.

3 – यह जरूरी नहीं होता है. कि सभी शिकायतकर्ताओं को अपराध के बारे में व्यक्तिगत जानकारी हो या फिर उसके सामने अपराध हुआ हो लेकिन फिर भी पुलिस को FIR दर्ज करनी पड़ती है.

4 -FIR में कोई भी पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से किसी भी तरह की टिप्पणियां शब्द या दूसरी चीजें नहीं लिख सकता है.यह सभी चीजें आपका अधिकार है. और आप इस को बिना किसी दिक्कत के पा सकते हैं.

और यदि इनमें से किसी भी बात के लिए पुलिस अधिकारी मना करता है. तो आप उसके लिए उसके वरिष्ठ अधिकारी या उसके अलावा उससे बड़े अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं.

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