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डिक्री के प्रकार | decree ke prakaar | Types of decree in hindi

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decree ke prakaar

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “ डिक्री के प्रकार | decree ke prakaar | Types of decree in hindi ” के विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

डिक्री के प्रकार | decree ke prakaar | Types of decree in hindi

डिक्री के प्रकार – डिक्री के प्रकार का वर्णन व्यवहार प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 2(2) के स्पष्टीकरण में किया गया है। जबकि प्रकार परिभाषा में ही दिये हैं।इसके अनुसार डिक्री दो प्रकार की होती है। 

१ – प्रारंभिक डिक्री 

२ – अंतिम डिक्री  

प्रारंभिक डिक्री 

प्रारंभिक डिक्री – डिक्री प्रारंभिक तब होती है जब वाद के पूर्ण रूप से निपटा दिये जाने के पहले आगे और कार्यवाही की जानी है। प्रारंभिक डिक्री उन मामलों में पारित की जाती है जिसमें न्यायालय को प्रथमत: पक्षकारों के अधिकारों पर न्यायनिर्णयन करना होता है तथा उसके पश्चात् उसमें अगली कार्यवाही करनी शेष रहती है.

न्यायालय निम्न वादों में प्रारंभिक डिक्री पारित कर सकता है-

1- कब्जा, किराया और अंतकालीन लाभों के लिये वाद (आदेश 20 नियम 12)

2- प्रशासनिक वाद (आदेश 20 नियम 13) 

3 – हकशुफा वाद (आदेश 20 नियम 14)

4 – साझेदारी से विघटन संबंधी वाद (आदेश 20 नियम 15)

5 – मालिक और एजेन्ट के बीच लेखे के लिये वाद (आदेश 20 नियम 16)

6- संपत्ति का बँटवारा और पृथक कब्जे का वाद (आदेश 20 नियम 18)

7- आदेश 34 के अंतर्गत भी निम्न मामलों में प्रारंभिक डिक्री पारित की जा सकती है-

1. पुरोबंध वाद (नियम 2)

2. बंधक संपत्ति के विक्रय हेतु (नियम 4)

3. विमोचन का वाद (नियम 7)

अंतिम डिक्री

अंतिम डिक्री :- वाद का पूर्णरूप से निपटारा करने वाली डिक्री अंतिम डिक्री कहलाती है।

अंशतः प्रारंभिक तथा अंशतः अंतिम डिक्री

अंशतः प्रारंभिक और अंशत: अंतिम डिक्री का प्रश्न वहीं उठता है जहाँ पर न्यायालय ने एक ही डिक्री के माध्यम से दो प्रश्नों पर निर्णय दिया है।

उदाहरणार्थ – जहाँ एक वाद कब्जे और अन्तःकालीन लाभ के लिये संस्थित किया गया है, तथा न्यायालय ने कब्जे और अंत:कालीन लाभ के लिये डिक्री पारित किया है, ऐसी स्थिति में जहाँ तक कब्जे का प्रश्न है डिक्री अंतिम होगी परंतु अंत:कालीन लाभ के लिये प्रारंभिक होगी क्योंकि अत:कालीन लाभ की अंतिम डिक्री तख पारित की जा सकती है जब अंत:कालीन लाभ की धनराशि का विनिश्चय जाँच के पश्चात् कर लिया जाये।

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