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धारा 4 संविदा अधिनियम | Section 4 Indian Contract act in Hindi

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आज के इस आर्टिकल में मै आपको संसूचना कब संपूर्ण हो जाती है | भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 क्या है | Section 4 Indian Contract act in Hindi | Section 4 of Indian Contract act | धारा 4 भारतीय संविदा अधिनियम | Communication when completeके विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 4 |  Section 4 of Indian Contract act

[ Indian Contract act Sec. 4 in Hindi ] –

संसूचना कब संपूर्ण हो जाती है

 प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब प्रस्थापना उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाती है जिसे वह की गई है। प्रतिग्रहण की संसूचना

प्रस्थापक के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह उसके प्रति इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह प्रतिगृहीता की शक्ति के बाहर हो जाए;

प्रतिगृहीता के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब वह प्रस्थापक के ज्ञान में आती है। प्रतिसंहरण की संसूचना

उसे करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है, जब वह उस व्यक्ति के प्रति, जिससे प्रतिसंहरण किया गया हो, इस प्रकार पारेषण के अनुक्रम में कर दी जाती है कि वह उस व्यक्ति की शक्ति के बाहर हो जाए, जो उसे करता है।

उस व्यक्ति के विरुद्ध, जिससे प्रतिसंहरण किया गया है, तब संपूर्ण हो जाती है, जब वह उसके ज्ञान में आती है।

दृष्टांत

(क) अमुक कीमत पर ख को गृह बेचने की पत्र द्वारा प्रस्थापना करता है।

प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब ख को पत्र प्राप्त होता है।

(ख) क की प्रस्थापना का ख डाक से भेजे गए पत्र को प्रतिग्रहण करता है।

प्रस्थापना की संसूचना तब संपूर्ण हो जाती है जब ख से पत्र प्राप्त होता है। प्रतिग्रहण की संसूचना

क के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब पत्र डाक में डाल दिया जाता है;

ख के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाती है जब क को पत्र प्राप्त होता है। (ग) क अपनी प्रस्थापना का प्रतिसंहरण तार द्वारा करता है।

क के विरुद्ध प्रतिसंहरण तब संपूर्ण हो जाता है जब तार प्रेषित किया जाता है । ख के विरुद्ध प्रतिसंहरण तब संपूर्ण हो जाता है जब ख को तार प्राप्त होता है।

ख अपने प्रतिग्रहण का प्रतिसंहरण तार द्वारा करता है । ख का प्रतिसंहरण ख के विरुद्ध तब संपूर्ण हो जाता है जब तार प्रेषित किया जाता है और क के विरुद्ध तब, जब तार उसके पास पहुंचता है।

धारा 4 Indian Contract act

[ Indian Contract act Sec. 4  in English ] –

“ Communication when complete ”–

The communication of a proposal is complete when it comes to the knowledge of the person to whom it is made.

The communication of an acceptance is complete,—

as against the proposer, when it is put in a course of transmission to him, so as to be out of the power of the acceptor;

as against the acceptor, when it comes to the knowledge of the proposer.

The communication of a revocation is complete,—

as against the person who makes it, when it is put into a course of transmission to the person to whom it is made, so as to be out of the power of the person who makes it;

as against the person to whom it is made, when it comes to his knowledge.

Illustrations

(a) A proposes, by letter, to sell a house to B at a certain price.

The communication of the proposal is complete when B receives the letter.

(b) B accepts A‟s proposal by a letter sent by post.

The communication of the acceptance is complete,

as against A when the letter is post;

as against B, when the letter is received by A.

(c) A revokes his proposal by telegram.

The revocation is complete as against A when the telegram is despatched. It is complete as against B when B receives it.

B revokes his acceptance by telegram. B‟s revocation is complete as against B when the telegram is despatched, and as against A when it reaches him.

धारा 4 Indian Contract act

भारतीय संविदा अधिनियम 

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Indian contract act 

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Section 1 of limitation act Section 1 of limitation act

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