धारा 35 सम्पत्ति अन्तरण | Section 35 of Transfer of property Act Hindi

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “निर्वाचन कब आवश्यक है | सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 35 क्या है | Section 35 Transfer of property Act in hindi | Section 35 of Transfer of property Act | धारा 35 सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम | Election: Election when necessaryके विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 35 |  Section 35 of Transfer of property Act | Section 35 Transfer of property Act in Hindi

[ Transfer of property Act Section 35 in Hindi ] –

निर्वाचन कब आवश्यक है-

जहां कि कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, जिसे अन्तरित करने का उसे कोई अधिकार नहीं है और उसी संव्यवहार के भागरूप कोई फायदा उस सम्पत्ति के स्वामी को प्रदत्त करता है वहां ऐसे स्वामी को निर्वाचन करना होगा कि वह या तो ऐसे अन्तरण को पुष्ट करे या उससे विसम्मत हो और पश्चात्कथित दशा में वह ऐसे प्रदत्त फायदे का त्याग करेगा और इस प्रकार त्यक्त फायदा अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को ऐसे प्रतिवर्तित हो जाएगा, मानो वह व्ययनित ही नहीं हुआ था, तथापि

जहां कि अन्तरण आनुग्रहिक है और जहां अन्तरक निर्वाचन किए जाने से पहले मर गया है या नवीन अन्तरण करने के लिए अन्यथा असमर्थ हो गया है,

और उन सब दशाओं में, जिनमें अन्तरण प्रतिफलार्थ है, निराश अन्तरिती को, प्रतिफल की रकम या उस सम्पत्ति के, जिसे उसको अन्तरित किए जाने का प्रयत्न किया गया था, मूल्य को चुका देने के भार के अध्यधीन ही वह फायदा प्रतिवर्तित होगा।

दृष्टांत

सुल्तानपुर का खेत ग की सम्पत्ति है और उसका मूल्य 800 रुपए है। क उसे दान की लिखत द्वारा ख को अंतरित करने की प्रव्यंजना करता है और उसी लिखत द्वारा ग को 1,000 रुपए देता है । ग खेत को अपने पास रखना निर्वाचित करता है। 1,000 रुपए का दान उससे समपहृत हो जाता है।

उसी मामले में क निर्वाचन के पहले मर जाता है। उसका प्रतिनिधि 1,000 रुपए में से 800 रुपए ख को देगा।

इस धारा के प्रथम पैरा का नियम लागू होता है चाहे अन्तरक यह विश्वास करता हो या न करता हो कि जिसका अन्तरण करने की वह प्रव्यंजना करता है, वह स्वयं उसकी अपनी है।

जो व्यक्ति किसी संव्यवहार के अधीन कोई फायदा सीधा नहीं लेता किन्तु उसके अधीन फायदा उसे परतः व्युत्पन्न होता है उसे निर्वाचन करने की आवश्यकता नहीं हैं।

जो व्यक्ति अपनी किसी एक हैसियत में कोई फायदा उस संव्यवहार के अधीन लेता है, वह किसी अन्य हैसियत में उससे विसम्मत हो सकेगा।

अन्तिम पूर्ववर्ती चारों नियमों का अपवाद-जहां कि उस सम्पत्ति के स्वामी को, जिसका अन्तरण करने की अन्तरक प्रत्र्यंजना करता है, कोई विशिष्ट फायदा प्रदत्त किया जाना अभिव्यक्त किया गया है और ऐसा फायदा उस सम्पत्ति के बदले में किया जाना अभिव्यक्त है, वहाँ यदि ऐसा स्वामी सम्पत्ति का दावा करे तो उसे विशिष्ट फायदे का त्याग करना होगा किन्तु वह उसी संत्र्यहार द्वारा उसे प्रदत्त किसी अन्य फायदे को त्यागने के लिए आबद्ध नहीं है।

जिस व्यक्ति को फायदा प्रदत्त किया गया है उस व्यक्ति द्वारा प्रतिग्रहण ही अन्तरण की पुष्टि के लिए उस द्वारा किया गया निर्वाचन गठित करता है, यदि वह निर्वाचन करने के अपने कर्तव्य को जानता हो और उन परिस्थितियों को जानता हो जो निर्वाचन करने में किसी युक्तिमान मनुष्य के निर्णय पर प्रभाव डालती है, अथवा यदि वह उन परिस्थितियों की जांच करने का अधित्यजन कर देता है।

यदि वह व्यक्ति, जिसे वह फायदा प्रदत्त किया गया है, विसम्मति अभिव्यक्त करने के लिए कोई कार्य किए बिना उसका उपभोग दो वर्ष तक कर लेता है तो ऐसा ज्ञान या अधित्यजन तत्प्रतिकूल साक्ष्य के अभाव में उपधारित कर लिया जाएगा।

ऐसा ज्ञान या अधित्यजन उसके किसी ऐसे कार्य से अनुमित किया जा सकेगा जिसने उस सम्पत्ति में, जिसके अन्तरित करने की प्रव्यंजना की गई है हितबद्ध व्यक्तियों को उसी दशा में रखना असम्भव बना दिया है जिसमें वे होते यदि वह कार्य न किया गया होता।

दृष्टांत

ख को क एक सम्पदा अन्तरित करता है, जिसका ग हकदार है, और उस संत्र्यहार के भागरूप ग को कोयले की एक खान देता है। ग खान को कब्जे में लेता है और उसे नि:शेष कर देता है । तद्द्वारा उसने सम्पदा के ख को अन्तरण की पुष्टि कर दी है।

यदि वह अन्तरण की तारीख से एक वर्ष के भीतर अन्तरण की पुष्टि करने का या उससे विसम्मति का अपना आशय अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को जता नहीं देता, तो अन्तरक या उसका प्रतिनिधि उस कालावधि के अवसान पर उससे यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह निर्वाचन करे और यदि वह ऐसी अपेक्षा की प्राप्ति के पश्चात् युक्तियुक्त समय के भीतर उसका पालन नहीं करता तो यह समझा जाएगा कि उसने उस अन्तरण की पुष्टि करने का निर्वाचन कर लिया है।

निर्योग्यता की दशा में निर्वाचन उस समय तक मुल्तवी रहेगा, जब तक उस निर्योग्यता का अन्त नहीं हो जाता, या जब तक निर्वाचन किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा नहीं किया जाता।

धारा 35 Transfer of property Act

[ Transfer of property Act Sec. 35 in English ] –

Election: Election when necessary ”–

Where a person professes to transfer property which he has no right to transfer, and as part of the same transaction confers any benefit on the owner of the property, such owner must elect either to confirm such transfer or to dissent from it; and in the latter case he shall relinquish the benefit so conferred, and the benefit so relinquished shall revert to the transferor or his representative as if it had not been disposed of, 

subject nevertheless, 

where the transfer is gratuitous, and the transferor has, before the election, died or otherwise become incapable of making a fresh transfer, 

and in all cases where the transfer is for consideration, 

to the charge of making good to the disappointed transferee the amount or value of the property attempted to be transferred to him. 

Illustrations 

The farm of Sultanpur is the property of C and worth Rs. 800. A by an instrument of gift professes to transfer it to B, giving by the same instrument Rs. 1,000 to C. C elects to retain the farm. He forfeits the gift of Rs. 1,000. 

In the same case, A dies before the election. His representative must out of the Rs. 1,000 pay Rs. 800 to B. The rule in the first paragraph of this section applies whether the transferor does or does not believe that which he professes to transfer to be his own. 

A person taking no benefit directly under a transaction, but deriving a benefit under it indirectly, need not elect. 

A person who in his one capacity takes a benefit under the transaction may in another dissent therefrom. 

Exception to the last preceding four rules.Where a particular benefit is expressed to be conferred on the owner of the property which the transferor professes to transfer, and such benefit is expressed to be in lieu of that property, if such owner claim the property, he must relinquish the particular benefit, but he is not bound to relinquish any other benefit conferred upon him by the same transaction. 

Acceptance of the benefit by the person on whom it is conferred constitutes an election by him to confirm the transfer, if he is aware of his duty to elect and of those circumstances which would influence the judgment of a reasonable man in making an election, or if he waives enquiry into the circumstances. 

Such knowledge or waiver shall, in the absence of evidence to the contrary, be presumed, if the person on whom the benefit has been conferred has enjoyed it for two years without doing any act to express dissent. 

Such knowledge of waiver may be inferred from any act of his which renders it impossible to place the persons interested in the property professed to be transferred in the same condition as if such act had not been done. 

Illustration 

A transfers to B an estate to which C is entitled, and as part of the same transaction gives C a coal-mine. C takes possession of the mine and exhausts it. He has thereby confirmed the transfer of the estate to B. 

If he does not within one year after the date of the transfer signify to the transferor or his representatives his intention to confirm or to dissent from the transfer, the transferor or his representative may, upon the expiration of that period, require him to make his election; and, if he does not comply with 

such requisition within a reasonable time after he has received it, he shall be deemed to have elected to confirm the transfer.

In case of disability, the election shall be postponed until the disability ceases, or until the election is made by some competent authority.

धारा 35 Transfer of property Act 

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम  

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Updated: May 24, 2020 — 8:24 pm

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