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धारा 3 परिसीमा अधिनियम | Section 3 of limitation act in Hindi

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आज के इस आर्टिकल में मै आपको “परिसीमा द्वारा वर्जन | परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 3 क्या है | Section 3 limitation act in Hindi | Section 3 of limitation act | धारा 3 परिसीमा अधिनियम 1963 | Bar of limitationके विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 3 |  Section 3 of limitation act

[ limitation act Sec. 3 in Hindi ] –

परिसीमा द्वारा वर्जन–

(1) धारा 4 से 24 तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं आती है), अन्तर्विष्ट उपबंधों के अध्यधीन यह है कि विहित काल के पश्चात् हर संस्थित वाद, की गई अपील और किया गया आवेदन खारिज कर दिया जाएगा यद्यपि प्रतिरक्षा के तौर पर परिसीमा की बात उठाई न गई हो।

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह है कि

(क) वाद की संस्थिति,

(i) मामूली दशा में तब होती है, जब वादपत्र उचित आफिसर के समक्ष उपस्थित किया जाता है;

(ii) अकिंचन की दशा में तब होती है, जब अकिंचन के तौर पर बाद लाने की इजाजत के लिए उसके द्वारा आवदेन किया जाता है; तथा

(iii) उस कम्पनी के विरुद्ध दावे की दशा में जिसका न्यायालय द्वारा परिसमापन किया जा रहा हो तब होती है जब दावेदार के दावे का परिदान शासकीय समापक को पहली बार कारित किया जाता है;

(ख) मुजरा या प्रतिदावे के तौर का दावा एक पृथक् वाद माना जाएगा, और यह समझा जाएगा कि ऐसा दावा

(i) मुजरे की दशा में, उसी तारीख को, जिसको वह वाद संस्थित किया गया हो जिसमें मुजरे का अभिवचन किया गया है:

(ii) प्रतिदावे की दशा में उस तारीख को जिसको न्यायालय में प्रतिदावा किया गया हो. संस्थित किया गया समझा जाएगा;

(ग) उच्च न्यायालय में प्रस्ताव की सूचना द्वारा आवेदन तब होता है, जब आवेदन उस न्यायालय के लिए उचित आफिसर के समक्ष उपस्थित किया जाता है।

धारा 3 limitation act

[ limitation act Sec. 3  in English ] –

“  Bar of limitation ”–

(1) Subject to the provisions contained in sections 4 to 24 (inclusive), every suit instituted, appeal preferred, and application made after the prescribed period shall be dismissed, although limitation has not been set up as a defence.
(2) For the purposes of this Act— (2) For the purposes of this Act—”

(a) a suit is instituted— (a) a suit is instituted—”

(i) in an ordinary case, when the plaint is presented to the proper officer; (i) in an ordinary case, when the plaint is presented to the proper officer;”
(ii) in the case of a pauper, when his application for leave to sue as a pauper is made; and (ii) in the case of a pauper, when his application for leave to sue as a pauper is made; and”
(iii) in the case of a claim against a company which is being wound up by the court, when the claimant first sends in his claim to the official liquidator; (iii) in the case of a claim against a company which is being wound up by the court, when the claimant first sends in his claim to the official liquidator;”
(b) any claim by way of a set off or a counter claim, shall be treated as a separate suit and shall be deemed to have been instituted— (b) any claim by way of a set off or a counter claim, shall be treated as a separate suit and shall be deemed to have been instituted—”

(i) in the case of a set off, on the same date as the suit in which the set off is pleaded; (i) in the case of a set off, on the same date as the suit in which the set off is pleaded;”
(ii) in the case of a counter claim, on the date on which the counter claim is made in court; (ii) in the case of a counter claim, on the date on which the counter claim is made in court;”
(c) an application by notice of motion in a High Court is made when the application is presented to the proper officer of that court.

धारा 3 limitation act

Limitation act Pdf download in hindi

Section 1 of limitation act Section 1 of limitation act

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