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धारा 2 संविदा अधिनियम | Section 2 Indian Contract act in Hindi

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आज के इस आर्टिकल में मै आपको “निर्वचन खंड  | भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 क्या है | Section 2 Indian Contract act in Hindi | Section 2 of Indian Contract act | धारा 2 भारतीय संविदा अधिनियम | Interpretation-clauseके विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 |  Section 2 of Indian Contract act

[ Indian Contract act Sec. 2 in Hindi ] –

निर्वचन खंड —

इस अधिनियम में, निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो

(क) जब कि एक व्यक्ति, किसी बात को करने या करने से प्रविरत रहने की अपनी रजामन्दी किसी अन्य को इस दृष्टि से संज्ञापित करता है कि ऐसे कार्य या प्रविरति के प्रति उस अन्य की अनुमति अभिप्राप्त करे तब वह प्रस्थापना करता है, यह कहा जाता है।

(ख) जब कि वह व्यक्ति, जिससे प्रस्थापना की जाती है उसके प्रति अपनी अनुमति संज्ञापित करता है तब वह प्रस्थापना प्रतिगृहीत हुई कही जाती है। प्रस्थापना प्रतिगृहीत हो जाने पर वचन हो जाती है;

(ग) प्रस्थापना करने वाला व्यक्ति, “वचनदाता” कहलाता है और प्रस्थापना प्रतिगृहीत करने वाला व्यक्ति “वचनगृहीता” कहलाता है;

(घ) जब कि वचनदाता की वांछा पर वचनगृहीता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरति या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है;

(ङ) हर एक वचन और ऐसे वचनों का हर एक संवर्ग, जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल हो, करार है;

(च) वे वचन जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल या प्रतिफल का भाग हों, व्यतिकारी वचन कहलाते हैं;

(छ) वह करार जो विधितः प्रवर्तनीय न हो, शून्य कहलाता है;

(ज) वह करार, जो विधितः प्रवर्तनीय हो, संविदा है;

(झ) वह करार, जो उसके पक्षकारों में से एक या अधिक के विकल्प पर तो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो, किंतु अन्य पक्षकार या पक्षकारों के विकल्प पर नहीं, शून्यकरणीय संविदा है;

(ञ) जो संविदा विधित: प्रवर्तनीय नहीं रह जाती वह तब शून्य हो जाती है जब वह प्रवर्तनीय नहीं रह जाती।

धारा 2 Indian Contract act

[ Indian Contract act Sec. 2  in English ] –

“ Interpretation-clause ”–

In this Act the following words and expressions are used in the following senses, unless a contrary intention appears from the context:—

(a) When one person signifies to another his willingness to do or to abstain from doing anything, with a view to obtaining the assent of that other to such act or abstinence, he is said to make a proposal;

(b) When the person to whom the proposal is made signifies his assent thereto, the proposal is said to be accepted. A proposal, when accepted, becomes a promise;

(c) The person making the proposal is called the “promisor”, and the person accepting the proposal is called the “promisee”;

(d) When, at the desire of the promisor, the promisee or any other person has done or abstained from doing, or does or abstains from doing, or promises to do or to abstain from doing, something, such act or abstinence or promise is called a consideration for the promise;

(e) Every promise and every set of promises, forming the consideration for each other, is an agreement;

(f) Promises which form the consideration or part of the consideration for each other are called reciprocal promises;

(g) An agreement not enforceable by law is said to be void;

(h) An agreement enforceable by law is a contract;

(i) An agreement which is enforceable by law at the option of one or more of the parties thereto, but not at the option of the other or others, is a voidable contract;

(j) A contract which ceases to be enforceable by law becomes void when it ceases to be enforceable.

धारा 2 Indian Contract act

भारतीय संविदा अधिनियम 

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Indian contract act 

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Section 1 of limitation act Section 1 of limitation act

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