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राष्ट्रपति का निर्वाचन , शक्ति ,कार्यकाल | President of India in Hindi

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President of India in Hindi

राष्ट्रपति का निर्वाचन , शक्ति ,कार्यकाल | President of India

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भारत के संविधान में औपचारिक रूप से संघ की कार्यपालिका की शक्तियाँ राष्ट्रपति को दी गयी है, परन्तु वास्तव में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बनी मंत्रिपरिषद् के माध्यम से राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग करता है.

राष्ट्रपति पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है, राष्ट्रपति पद के लिए सीधा जनता के द्वारा निवार्चन नहीं होता. उसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके से होता है.

इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन आम नागरिक नहीं बल्कि निर्वाचित विधायक और सांसद करते हैं.

यह निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत के सिद्धांत के अनुसार होता है.

केवल संसद ही राष्ट्रपति को महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा उसे पद से हटा सकती है. महाभियोग केवल संविधान के उल्लंघन के आधार पर लगाया जा सकता है.

राष्ट्रपति का निर्वाचन , शक्ति ,कार्यकाल | President of India

नीचे राष्ट्रपति से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण अनुछेद दिए जा रहे हैं , जो प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु अति आवश्यक हैं .

भारत का राष्ट्रपति

अनुछेद  52 – भारत का एक  राष्ट्रपति  होगा ।

संघ की कार्यपालिका शक्ति

अनुछेद 53 –

(1) संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा ।

(2) पूर्वगामी उपबंध  की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश राष्ट्रपति में निहित होगा और उसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा ।

(3) इस अनुच्छेद की कोई बात–

(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी राज्य की सरकार या अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कॄत्य राष्ट्रपति को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी ; या

(ख) राष्ट्रपति  से भिन्न अन्य प्राधिकारियों को विधि द्वारा कॄत्य प्रदान करने से संसद् को निवारित नहीं करेगी ।

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राष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुछेद 54 – राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचकगण के सदस्य करेंगे जिसमें- 

(क) संसद् के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य ; और

(ख) राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य, होंगे ।

राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति

अनुछेद 55 –

(1) जहां तक साध्य हो, राष्ट्रपति  के निर्वाचन में भिन्न-भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता होगी ।

(2) राज्यों में आफस में एसी एकरूपता तथा समस्त राज्यों और संघ में समतुल्यता प्राप्त कराने के लिए संसद् और प्रत्येक राज्य की विधान सभा का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य ऐसे निर्वाचन में जितने मत देने का हकदार है उनकी संख्या निम्नलिखित रीति से अवधारित की जाएगी  ,

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अर्थात् :–

(क) किसी राज्य की विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के उतने मत होंगे जितने कि एक हजार के गुणित उस भागफल में हों जो राज्य की जनसंख्या को उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए ;

(ख) यदि एक हजार के उक्त  गुणितों को लेने के बाद शेष पांच सौ से कम नहीं है तो उपखंड (क) में निार्दिष्ट प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़  दिया जाएगा ;

(ग) संसद् के प्रत्येक सदन के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या वह होगी जो उपखंड (क)और उपखंड (ख) के अधीन

राज्यों की विधान सभाओं के सदस्यों के लिए  नियत कुल मतों की संख्या को, संसद् के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए, जिसमें आधे से अधिक भिन्न को एक गिना जाएगा और अन्य भिन्नों की उपेक्षा की जाएगी ।

(3) राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा ।

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[2][स्पष्टीकरण ––इस अनुच्छेद में, “जनसंख्या” पद से ऐसी अंतिम पूर्ववर्ती जगणना में अभिनिाश्चित की गई जनसंख्या अभिप्रेत है जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं :

परंतु  इस स्पष्टीकरण में अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के प्रति, जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं, निर्देशका, जब तक सन्

[3][2026] के पश्चात् की गई पहली  जनगणना के सुसंगत आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते हैं, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह 1971 की जनगणना के प्रति निर्देश है ।]

राष्ट्रपति  की पदावधि

अनुछेद 56 – 

(1) राष्ट्रपति  अपने  पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा :

परंतु–

(क)     राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ;

(ख)    संविधान का अतिक्रमण करने पर  राष्ट्रपति को अनुच्छेद 61 में उपबंधित रीति से चलाए गए महाभियोग द्वारा पद से हटाया जा सकेगा ;

(ग)     राष्ट्रपति , अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर  भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद  ग्रहण नहीं  कर लेता है ।

(2) खंड (1) के परंतुक  के खंड (क) के अधीन उपराष्ट्रपति को संबोधित त्यागपत्र की सूचना उसके द्वारा लोक सभा के अध्यक्ष को तुरंत दी जाएगी  ।

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पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता

अनुछेद 57 – 

कोई व्यक्ति , जो राष्ट्रपति के रूप में पद धारण करता है या कर चुका है, इस संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए उस पद  के लिए  पुनर्निर्वाचन का पात्र होगा ।

राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए योग्यता

अनुछेद 58 – 

(1) कोई व्यक्ति  राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र  तभी होगा जब वह–

(क) भारत का नागरिक है,

(ख) फैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और

(ग) लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है ।

(2) कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा ।

स्पष्टीकरण –इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए , कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल[4] ***है अथवा संघ का या किसी राज्य का मंत्री है ।

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राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें

अनुछेद 59 – 

(1) राष्ट्रपति संसद् के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं  होगा और यदि संसद् के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा  कि उसने उस सदन में अपना स्थान राष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है ।

(2) राष्ट्रपति अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा ।

(3) राष्ट्रपति , बिना किराया दिए, अपने शासकीय निवासों के उपयोग का हकदार होगा और ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का भी, जो संसद्, विधि द्वारा अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिार्दिष्ट हैं, हकदार होगा ।

(4) राष्ट्रपति की उपलब्धियां और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किएं जाएंगे ।

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राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

अनुछेद 60 – प्रत्येक राष्ट्रपति और प्रत्येक व्यक्ति, जो राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा है या उसके कॄत्यों का निर्वहन कर रहा है, अपना पद ग्रहण करने से पहले भारत के मुख्य न्यायमूार्ति या उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप  में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर  अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात् :–

ईश्वर की शपथ लेता हूं

“मैं, अमुक ——————————-कि मैं श्रद्धापूर्वक भारत के राष्ट्रपति के पद का कार्यपालन

सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं

(अथवा राष्ट्रपति के कॄत्यों का निर्वहन) करूंगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूंगा और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूंगा ।”।

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राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया

अनुछेद 61 –

(1) जब संविधान के अतिक्रमण के लिए राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाना हो, तब संसद् का कोई सदन आरोप लगाएगा ।

(2) ऐसा कोई आरोप तब तक नहीं लगाया जाएगा जब तक कि—

(क) ऐसा आरोप लगाने की प्रस्थापना किसी ऐसे संकल्प में अंतर्विष्ट नहीं  है, जो कम से कम चौदह दिन की ऐसी लिखित सूचना के दिए जाने के पश्चात् प्रस्तावित किया गया है जिस पर उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों ने हस्ताक्षर करके उस संकल्प को प्रस्तावित करने का अपना आशय प्रकट किया है ; और

(ख) उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा ऐसा संकल्प पारित नहीं किया गया है ।

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(3) जब आरोप संसद् के किसी सदन द्वारा इस प्रकार लगाया गया है तब दूसरा सदन उस आरोप का अन्वेषण करेगा या कराएगा और ऐसे अन्वेषण में उपस्थित होने का तथा अपना प्रतिनिधित्व कराने का राष्ट्रपति को अधिकार होगा ।

(4) यदि अन्वेषण  के परिणामस्वरूप  यह घोषित करने वाला संकल्प कि राष्ट्रपति के विरुद्ध लगाया गया आरोप सिद्ध हो गया है, आरोप का अन्वेषण करने या कराने वाले सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया जाता है तो ऐसे संकल्प का प्रभाव उसके इस प्रकार पारित किए जाने की तारीख से राष्ट्रपति को उसके पद से हटाना होगा ।

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राष्ट्रपति के पद में रिक्ति  को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकास्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति की पदावधि

अनुछेद 62 –

(1) राष्ट्रपति की पदावधि  की समाप्ति  से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि  की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा  ।

(2) राष्ट्रपति की मॄत्यु, पद त्याग या पद  से हटाए  जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए  निर्वाचन, रिक्ति होने की तारीख के पश्चात् यथाशीघ्र और प्रत्येक दशा में छह मास बीतने से पहले  किया जाएगा और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति , अनुच्छेद 56 के उपबंधों के अधीन रहते हुए , अपने  पद ग्रहण की तारीख से पांच  वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण करने का हकदार होगा ।

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क्षमा आदि की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुछेद 72 – 

(1) राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए  सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघूकरण की–

(क) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश सेना न्यायालय ने दिया है,

(ख) उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है,

(ग) उन सभी मामलों में, जिनमें दंडादेश, मॄत्यु दंडादेश है, शक्ति होगी ।

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(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात संघ के सशस्त्र बलों के किसी आफिसर की सेना न्यायालय द्वारा पारित  दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघूकरण की विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

(3) खंड (1) के उपखंड (ग) की कोई बात तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि के अधीन किसी राज्य के राज्यपाल [8]***द्वारा प्रयोक्तव्य मॄत्यु दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघूकरण की शक्ति पर प्रभाव नहीं  डालेगी ।

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राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

अनुछेद 74 –

(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए  एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधान मंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कॄत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा

[परंतु राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से ऐसी सलाह पर साधारणतया या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के पश्चात् दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा ।]

(2) इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जाएगी  कि क्या मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी,और यदि दी तो क्या दी ।

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उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति

अनुछेद 143 –

(1) यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकॄति का और ऐसे   व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा ।

(2) राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 [65]* * * के परन्तुक में किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार के विवाद को, जो [66][उक्त   परन्तुक ] में वार्णित है, राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और उच्चतम न्यायालय, ऐसी  सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा ।

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आपात  की उद्घोषणा

अनुछेद 352 – 

(1) यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि गंभीर आपात विद्यमान है जिसे युद्ध या वाह्य आक्रमण या [1][सशस्त्र विद्रोह] के कारण भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा संकट में है तो वह उद्घोषणा  द्वारा [2][संपूर्ण भारत या उसके राज्यक्षेत्र के ऐसे  भाग के संबंध में जो उद्घोषणा में विनिर्दिष्ट किया जाए] इस आशय की घोषणा  कर सकेगा ।

[3][स्पष्टीकरण–यदि राष्ट्रपति  का यह समाधान हो जाता है कि युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह का संकट सन्निकट है तो यह घोषित करने वाली आपात की उद्घोषणा कि युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा संकट में है, युद्ध या ऐसे किसी आक्रमण या विद्रोह के वास्तव में होने से पहले भी की जा सकेगी।]

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[4][(2) खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा में किसी पश्चात् वर्ती उद्घोषणा द्वारा परिवर्तन किया जा सकेगा या उसको वापस लिया जा सकेगा।

(3) राष्ट्रपति , खंड (1) के अधीन उद्घोषणा या ऐसी उद्घोषणा में परिवर्तन करने वाली उद्घोषणा तब तक नहीं करेगा जब तक संघ के मंत्रिमंडल का (अर्थात् उस परिषद् का जो अनुच्छेद 75 के अधीन प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल स्तर के अन्य मंत्रियों से मिलकर बनती है) यह विनिश्चय कि ऐसी उद्घोषणा की जाए, उसे लिखित रूप में संसूचित नहीं किया जाता है।

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(4) इस अनुच्छेद के अधीन की गई प्रत्येक उद्घोषणा संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी और जहां वह पूर्ववर्ती उद्घोषणा को वापस लेने वाली उद्घोषणा नहीं है वहां वह एक मास की समाप्ति पर, यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले  संसद् के दोनों सदनों के संकल्पों द्वारा उसका अनुमोदन नहीं कर दिया जाता है तो, प्रवर्तन में नहीं रहेगी :

परन्तु यदि ऐसी कोई उद्घोषणा (जो पूर्व वर्ती उद्घोषणा को वापस लेने वाली उद्घोषणा नहीं है) उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है या लोक सभा का विघटन इस खंड में निर्दिष्ट एक मास की अवधि के दौरान हो जाता है और यदि उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया है, किन्तु ऐसी  उद्घोषणा  के संबंध में कोई संकल्प लोक सभा द्वारा उस अवधि की समाप्ति से पहले पारित नहीं किया गया है तो, उद्घोषणा उस तारीख से जिसको लोक सभा अपने पुनर्गठन के पश्चात् प्रथम बार बैठती है, तीस दिन की समाप्ति पर, प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति से पहले उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प लोक सभा द्वारा भी पारित नहीं कर दिया जाता है।

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(5) इस प्रकार अनुमोदित उद्घोषणा, यदि वापस नहीं ली जाती है तो, खंड (4) के अधीन उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाले संकल्पों में से दूसरे संकल्प के पारित किए जाने की तारीख से छह मास की अवधि की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगी :

परन्तु यदि और जितनी बार ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प संसद् के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाता है तो और उतनी बार वह उद्घोषणा, यदि वापस नहीं ली जाती है तो, उस तारीख से जिसको वह इस खंड के अधीन अन्यथा प्रवर्तन में नहीं रहती, छह मास की और अवधि तक प्रवॄत्त बनी रहेगी :

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परन्तु यह और कि यदि लोक सभा का विघटन छह मास की ऐसी अवधि के दौरान हो जाता है और ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया है, किन्तु ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए  रखने के संबंध में कोई संकल्प लोक सभा द्वारा उक्त अवधि के दौरान पारित नहीं किया गया है तो, उद्घोषणा उस तारीख से जिसको लोक सभा अपने पुनर्गठन के पश्चात् प्रथम बार बैठती है, तीस दिन की समाप्ति पर, प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति से पहले उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प लोक सभा द्वारा भी पारित नहीं कर दिया जाता है।

(6) खंड (4) और खंड (5) के प्रयोजनों के लिए, संकल्प संसद् के किसी सदन द्वारा उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उस सदन के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा ही पारित किया जा सकेगा।

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(7) पूर्वगामी खंडों में किसी बात के होते हुए भी, यदि लोक सभा खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा या ऐसी उद्घोषणा में परिवर्तन करने वाली उद्घोषणा का, यथास्थिति, अननुमोदन या उसे प्रवॄत्त बनाए रखने का अननुमोदन करने वाला संकल्प  पारित कर देती है तो राष्ट्रपति ऐसी उद्घोषणा को वापस ले लेगा।

(8) जहां खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा या ऐसी उद्घोषणा में परिवर्तन करने वाली उद्घोषणा का, यथास्थिति, अननुमोदन या उसको प्रवॄत्त बनाए रखने का अननुमोदन करने वाले संकल्प को प्रस्तावित करने के अपने आशय की सूचना लोक सभा की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दसवें भाग द्वारा हस्ताक्षर करके लिखित रूप में,–

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(क) यदि लोक सभा सत्र में है तो अध्यक्ष को, या

(ख) यदि लोक सभा सत्र में नहीं है तो राष्ट्रपति को, दी गई है वहां ऐसे संकल्प पर विचार करने के परियोजन के लिए  लोक सभा की विशेष बैठक, यथास्थिति, अध्यक्ष या राष्ट्रपति  को ऐसी सूचना प्राप्त होने की तारीख से चौदह दिन के भीतर की जाएगी]

[5][[6][(9)]इस अनुच्छेद द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्ति के अंतर्गत, युद्ध या वाह्य आक्रमण या [7][सशस्त्र विद्रोह] के अथवा युद्ध या वाह्य आक्रमण या 3[सशस्त्र विद्रोह] का संकट सान्निकट होने के विभिन्न आधारों पर विभिन्न उद्घोषणाएं करने की शक्ति  होगी चाहे राष्ट्रपति ने खंड (1) के अधीन पहले ही कोई उद्घोषणा की है या नहीं और ऐसी उद्घोषणा परिवर्तन में है या नहीं।

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राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में आपातकाल की घोषणा

अनुछेद 356 – 

(1) यदि राष्ट्रपति का किसी राज्य के राज्यपाल [10]*** से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा–

(क) उस राज्य की सरकार के सभी या कोई कॄत्य और [11][राज्यपाल] में या राज्य के विधान-मंडल से भिन्न राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी में निहित या उसके द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या कोई शक्तियां अपने हाथ में ले सकेगा;

(ख) यह घोषणा कर सकेगा कि राज्य के विधान-मंडल की शक्तियां संसद् द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रयोक्तव्य होंगी ;

(ग) राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी से संबंधित इस संविधान के किन्हीं उपबंधों के प्रवर्तन को पूर्णतः या भागतः निलंबित करने के लिए उपबंधों सहित ऐसे आनुषांगिक और पारिणामिक उपबंध कर सकेगा जो उद्घोषणा के उद्देश्यों को प्रभावी करने के लिए राष्ट्रपति को आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हों:

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परन्तु इस खंड की कोई बात राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय में निहित या उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति को अपने हाथ में लेने या उच्च न्यायालयों से संबंधित इस संविधान के किसी उपबंध के प्रवर्तन को पूर्णतः या भागतः निलंबित करने के लिए  प्राधिकॄत नहीं करेगी।

(2) ऐसी कोई उद्घोषणा किसी पश्चात् वर्ती उद्घोषणा द्वारा वापस ली जा सकेगी या उसमें परिवर्तन किया जा सकेगा।

(3) इस अनुच्छेद के अधीन की गई प्रत्येक उद्घोषणा संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी और जहां वह पूर्ववर्ती उद्घोषणा को वापस लेने वाली उद्घोषणा नहीं है वहां वह दो मास की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले संसद् के दोनों सदनों के संकल्पों द्वारा उसका अनुमोदन नहीं कर दिया जाता है:

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परन्तु यदि ऐसी कोई उद्घोषणा (जो पूर्ववर्ती उद्घोषणा को वापस लेने वाली उद्घोषणा नहीं है) उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है या लोक सभा का विघटन इस खंड में निर्दिष्ट दो मास की अवधि के दौरान हो जाता है और यदि उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया है,

किन्तु ऐसी उद्घोषणा के संबंध में कोई संकल्प लोक सभा द्वारा उस अवधि की समाप्ति से पहले पारित नहीं किया गया है तो, उद्घोषणा उस तारीख से जिसको लोक सभा अपने पुनर्गठन के पश्चात् प्रथम बार बैठती है, तीस दिन की समाप्ति पर, प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति से पहले उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प लोक सभा द्वारा भी पारित नहीं कर दिया जाता है।

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(4) इस प्रकार अनुमोदित उद्घोषणा, यदि वापस नहीं ली जाती है तो, [12][ऐसी उद्घोषणा के किए जाने की तारीख से छह मास] की अवधि की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगी:

परन्तु यदि और जितनी बार ऐसी  उद्घोषणा  को प्रवॄत्त बनाए  रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प  संसद् के दोनों सदनों द्वारा पारित  कर दिया जाता है तो और उतनी बार वह उद्घोषणा , यदि वापस नहीं ली जाती है तो, उस तारीख से जिसको वह इस खंड के अधीन अन्यथा प्रवर्तन में नहीं रहती है, [13][छह मास] की अवधि तक प्रवॄत्त बनी रहेगी, किन्तु ऐसी उद्घोषणा किसी भी दशा में तीन वर्ष से अधिक प्रवॄत्त नहीं रहेगी :

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परन्तु यह और कि यदि लोक सभा का विघटन [14][छह मास] की ऐसी  अवधि के दौरान हो जाता है और ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया है, किन्तु ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने के संबंध में कोई संकल्प लोक सभा द्वारा उक्त अवधि के दौरान पारित नहीं किया गया है तो, उद्घोषणा उस तारीख से, जिसको लोक सभा अपने पुनर्गठन के पश्चात् प्रथम बार बैठती है, तीस दिन की समाप्ति पर, प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति से पहले उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने का अनुमोदन करने वाला संकल्प लोक सभा द्वारा भी पारित नहीं कर दिया जाता है:

2[परन्तु यह भी कि पंजाब राज्य की बाबत 11मई, 1987 को खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा की दशा में, इस खंड के पहले  परन्तुक में “तीन वर्ष” के प्रति निर्देश का इस प्रकार अर्थ लगाया जाएगा मानो वह [15][पांच वर्ष] के प्रति निर्देश हो।]

[16][(5) खंड (4) में किसी बात के होते हुए भी, खंड (3) के अधीन अनुमोदित उद्घोषणा के किए जाने की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति से आगे किसी अवधि के लिए ऐसी उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखने के संबंध में कोई संकल्प संसद् के किसी सदन द्वारा तभी पारित किया जाएगा जब–

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(क) ऐसे  संकल्प  के पारित  किए  जाने के समय आपात  की उद्घोषणा, यथास्थिति, अथवा संपूर्ण भारत में संपूर्ण राज्य या उसके किसी भाग में प्रवर्तन में है; और

(ख) निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित कर देता है कि ऐसे संकल्प में विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान खंड (3) के अधीन अनुमोदित उद्घोषणा को प्रवॄत्त बनाए रखना, संबंधित राज्य की विधान सभा के साधारण निर्वाचन कराने में कठिनाइयों के कारण, आवश्यक है:]

[17][परन्तु इस खंड की कोई बात पंजाब राज्य की बाबत 11 मई, 1987 को खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा  को लागू नहीं  होगी।]

वित्तीय आपात के बारे में उपबंध

अनुछेद 360 – 

(1) यदि राष्ट्रपति  का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या प्रत्यय संकट में है तो वह उद्घोषणा द्वारा इस आशय की घोषणा कर सकेगा।

[31][(2) खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा —

(क) किसी पश्चात् वर्ती उद्घोषणा द्वारा वापस ली जा सकेगी या परिवर्तित की जा सकेगी ;

(ख) संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ;

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(ग) दो मास की समाप्ति पर, प्रवर्तन में नहीं रहेगी यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले संसद् के दोनों सदनों के संकल्पों द्वारा उसका अनुमोदन नहीं कर दिया जाता है:

परन्तु यदि ऐसी कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है या लोकसभा का विघटन उपखंड (ग) में निर्दिष्ट दो मास की अवधि के दौरान हो जाता है और यदि उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया है, किन्तु ऐसी उद्घोषणा के संबंध में कोई संकल्प लोक सभा द्वारा उस अवधि की समाप्ति से पहले  पारित नहीं किया गया है तो उद्घोषणा उस तारीख से, जिसको लोक सभा अपने पुनर्गठन के पश्चात् प्रथम बार बैठती है, तीस दिन की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं  रहेगी यदि उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति से पहले उद्घोषणा का अनुमोदन करने वाला संकल्प  लोक सभा द्वारा भी पारित नहीं कर दिया जाता है।]

(3) उस अवधि के दौरान, जिसमें खंड (1) में उाल्लिखित उद्घोषणा प्रवॄत्त रहती है, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्यको वित्तीय औचित्य संबंधी ऐसे  सिद्धांतों का पालन करने के लिए निदेश देने तक, जो निदेशों में विनिर्दिष्ट किए जाएं, और ऐसे अन्य निदेश देने तक होगा जिन्हें राष्ट्रपति उस प्रयोजन के लिए देना आवश्यक और पर्याप्त समझे।

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(4) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,–

(क) ऐसे किसी निदेश के अंतर्गत–

(त्) किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले सभी या किसी वर्ग के व्यक्तियों के वेतनों और भत्तों में कमी की अपेक्षा करने वाला उपबंध;

(त्त्) धन विधेयकों या अन्य ऐसे विधेयकों को, जिनको अनुच्छेद207 के उपबंध  लागू होते हैं, राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित  किए जाने के पश्चात् राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखने के लिए उपबंध, हो सकेंगे ;

(ख) राष्ट्रपति, उस अवधि के दौरान, जिसमें इस अनुच्छेद के अधीन की गई उद्घोषणा प्रवॄत्त रहती है, संघ के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले सभी या किसी वर्ग के व्यक्तियों के, जिनके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश हैं, वेतनों और भत्तों में कमी करने के लिए निदेश देने के लिए सक्षम होगा।


राष्ट्रपति इन्हें नियुक्त करता है
  1. प्रधानमंत्री
  2. मंत्रिपरिषद् के अन्य मंत्री
  3. भारत का महान्यायवादी
  4. नियंत्रक महालेखा परीक्षक
  5. उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीश
  6. राज्यों के राज्यपाल
  7. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
  8. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य
  9. वित्त आयोग के अध्यक्ष
  10. मुख्य तथा अन्य आयुक्त इत्यादि
राष्ट्रपति इन्हें पद से हटा सकता है
  1. मंत्रिपरिषद् के मंत्री
  2. राज्य का राज्यपाल
  3. उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट पर लोक सेवा आयोग के (संघ या राज्य) अध्यक्ष या सदस्य
  4. संसद की रिपोर्ट पर उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या निर्वाचन आयुक्त

 

 

भारत का संविधान भाग १ | Constitution of India part 1 in Hindi

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