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धारा 84 क्या है | 84 Ipc in Hindi | IPC Section 84

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84 Ipc in Hindi

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “ विकृतचित व्यक्ति का कार्य | भारतीय दंड संहिता की धारा 84 क्या है | 84 Ipc in Hindi | IPC Section 84 | Act of a person of unsound mind के विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

भारतीय दंड संहिता की धारा 84 क्या है | 84 Ipc in Hindi

[ Ipc Sec. 84 ] हिंदी में –

विकृतचित व्यक्ति का कार्य-

कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है |

टिप्पणी

यदि अपराध कारित करते समय अभियुक्त यह जानता था कि वह विधि के विरुद्ध कार्य कर रहा है तो ऐसा होने पर वह दण्डित हो सकेगा।

प्रत्येक व्यक्ति को यह समझा जाना चाहिए कि वह स्वस्थ चित्त है और उसके पास अपराध के लिए उत्तरदायी होने के कारण की पर्याप्त मात्रा है, जब तक कि इसके विपरीत उसके संतोष तक साबित न हो जाये। उन्मत्तता के आधार पर प्रतिरक्षा सिद्ध करने के लिए यह स्पष्टतया साबित किया जाना आवश्यक है कि कार्य करने के समय अभियुक्त कारण के अभाव से विकृतचित्त की बीमारी के कारण इतना ग्रस्त था कि वह जो कार्य कर रहा था उसकी प्रकृति और गुण का उसे ज्ञान नहीं था। आर बनाम मैकनाटन, (1843) 8 E.R. 1718.

[ Ipc Sec. 84 ] अंग्रेजी में –

“Act of a person of unsound mind ”–

Nothing is an offence which is done by a person who, at the time of doing it, by reason of unsoundness of mind, is incapable of knowing the nature of the act, or that he is doing what is either wrong or contrary to law.

NOTES –

If accused knew at the time of committing such crime that he was acting contrary to law, he will be punished.

That every man is to be presumed to be sane and to possess a sufficient degree of reason to be responsible of his crime, until the contrary is proved to their satisfaction and that to establish a defence on the ground of insanity it must be clearly proved that, at the time of committing the act the accused was labouring under such a defect of reason, from disease of the mind, as not to know the nature and quality of the act he was doing. R. v. Mc Naughten, (1843) 8 E.R. 1718.

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