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आईपीसी की धारा 340 | 340 IPC | wrongful confinement

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340 Ipc | wrongful confinement

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “आईपीसी की धारा 340 | 340 IPC | wrongful confinement | सदोष परिरोध  “, के विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

सदोष परिरोध क्या है ?

भारतीय दंड संहिता की धारा 340 के अनुसार – 

जो भी कोई किसी व्यक्ति का गलत तरीके से अवरोध करता है कि उस व्यक्ति को निश्चित सीमा से परे जाने से निवारित कर दे, वह उस व्यक्ति को गलत तरीके से प्रतिबंधित करना कहलाता है।

दृष्टांत-

(क) “य” को दीवार से घिरे हुए स्थान में प्रवेश कराकर “क” उसमें ताला लगा देता है । इस प्रकार “य” दीवार की परिसीमा से परे किसी भी दिशा में नहीं जा सकता । “क” ने “य” का गलत तरीके से प्रतिबंधित किया है ।

(ख) “क” एक भवन के बाहर जाने के द्वारों पर बन्दूकधारी मनुष्यों को बैठा देता है और “य” से कह देता है कि यदि “य” भवन के बाहर जाने का प्रयत्न करेगा, तो वे “य” को गोली मार देंगे । “क” ने “य” का गलत तरीके से प्रतिबंधित किया है ।

[ 340 Ipc | wrongful confinement ] 

Whoever wrongfully restrains any person in such a manner as to prevent that person from proceeding beyond certain circumscribing limits, is said “wrongfully to confine” that person.

Illustrations

  1. A causes Z to go within a walled space, and locks Z. Z is thus prevented from proceeding in any direction beyond the circumscribing line of wall. A wrongfully confines z.
  2. A places men with firearms at the outlets of a building, and tells Z that they will fire at Z if Z attempts leave the building. A wrongfully confines Z.

यदि आपका ” आईपीसी की धारा 339 | 339 IPC | wrongful restraint  से सम्बंधित कोई प्रश्न है तो आप कमेट के माध्यम से हम से पूछ सकते हैं ।

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