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धारा 57 सम्पत्ति अन्तरण | Section 57 of Transfer of property Act Hindi

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Section 57 of Transfer of property Act

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “बिल्लंगमों और उनसे मुक्त विक्रय के लिए न्यायालय द्वारा उपबंध | सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 57 क्या है | Section 57 Transfer of property Act in hindi | Section 57 of Transfer of property Act | धारा 57 सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम | Provision by Court for incumbrances, and sale freed therefrom के विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 57 |  Section 57 of Transfer of property Act | Section 57 Transfer of property Act in Hindi

[ Transfer of property Act Section 57 in Hindi ] –

बिल्लंगमों और उनसे मुक्त विक्रय के लिए न्यायालय द्वारा उपबंध—

(क) जहां कि स्थावर सम्पत्ति, जो किसी विल्लंगम के, चाहे वह तुरन्त देय हो या नहीं, अध्यधीन है, किसी न्यायालय द्वारा या किसी डिक्री के निष्पादन में या न्यायालय से बाहर बेची जाती है, वहां विक्रय के किसी पक्षकार के आवेदन पर न्यायालय, यदि वह ठीक समझे

(1) उस सम्पत्ति पर भारित वार्षिक या मासिक राशि, या उस सम्पत्ति में के अवधारणीय हित पर भारित मूलधन की दशा में इतनी रकम, जितनी न्यायालय ठीक समझे कि केन्द्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में विनिहित किए जाने पर उनके व्याज के सहारे वह उस भार को नीचा रखने या उसके लिए अन्यथा उपबन्ध करने को पर्याप्त होगी, तथा

(2) उस सम्पत्ति पर भारित मूलधन की किसी अन्य दशा में उस बिल्लंगम को और उस पर शोध्य ब्याज को चुकाने के लिए पर्याप्त रकम, न्यायालय में जमा किए जाने के लिए निदेश या अनुज्ञा दे सकेगा।

किन्तु इन दोनों दशाओं में से हर एक में इतनी अतिरिक्त रकम भी, जितनी के बारे में न्यायालय समझता है कि वह सम्भावित अतिरिक्त खर्चे, व्ययों और ब्याज के लिए और विनिधानों के अवक्षयण के सिवाय किसी अन्य आकस्मिकता के लिए भुगतान करने को पर्याप्त होगी और जो मूल रकम के दशमांश से तब के सिवाय अधिक न होगी जबकि न्यायालय विशेष कारणों के लिए, जिन्हें वह अभिलिखित करेगा, यह ठीक समझता हो कि दशमांश से अधिक अतिरिक्त रकम अपेक्षित की जाए. न्यायालय में जमा की जाएगी।

(ख) तदुपरि न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो, और बिल्लंगमदार को सूचना देने के पश्चात् जब तक कि न्यायालय विल्लंगमदार को ऐसी सूचना का दिया जाना लिखित रूप से अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के लिए अभिमुक्त न कर दे, सम्पत्ति को विल्लंगम से मुक्त घोषित कर सकेगा और ऐसा हस्तान्तरण-आदेश, या निधान-आदेश, जो विक्रय को प्रभावी करने के लिए उपयुक्त हो, दे सकेगा और न्यायालय में जमा धन के प्रतिधारण और विनिधान के लिए निदेश दे सकेगा।

(ग) न्यायालय में के उस धन या निधि में हित या उन पर हक रखने वाले व्यक्तियों पर सूचना की तामील होने के पश्चात् न्यायालय ऐसे व्यक्तियों को उसके दिए जाने या अन्तरित किए जाने के लिए निदेश दे सकेगा जो उसे प्राप्त करने या उसके लिए उन्मोचन देने के हकदार हैं और साधारणतया उस मूलधन या उसकी आय के उपयोजन या वितरण के बारे में निदेश दे सकेगा।

(घ) इस धारा के अधीन की गई किसी घोषणा, आदेश या निदेश के विरुद्ध अपील उसी प्रकार होगी मानो वह डिक्री हो।

(ङ) इस धारा में “न्यायालय से अभिप्रेत है (1) अपने मामूली या गैर-मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करता हुआ उच्च न्यायालय, (2) जिला न्यायाधीश का न्यायालय जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर सम्पत्ति या उसका कोई भाग स्थित है, (3) अन्य कोई न्यायालय, जिसे समय-समय पर राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए सक्षम घोषित करे।

धारा 57 Transfer of property Act

[ Transfer of property Act Sec. 57 in English ] –

“Provision by Court for incumbrances, and sale freed therefrom”–

(a) Where immoveable property subject to any incumbrance, whether immediately payable or not, is sold by the Court or in execution of a decree, or out of Court, the Court may, if it thinks fit, on the application of any party to the sale, direct or allow payment into Court,—

(1) in case of an annual or monthly sum charged on the property, or of a capital sum charged on a determinable interest in the property,—of such amount as, when invested in securities of the Central Government, the Court considers will be sufficient, by means of the interest thereof, to keep down or otherwise provide for that charge, and 

(2) in any other case of a capital sum charged on the property,—of the amount sufficient to meet the incumbrance and any interest due thereon. But in either case there shall also be paid into Court such additional amount as the Court considers will be sufficient to meet the contingency of further costs, expenses and interest, and any other contingency, except depreciation of investments, not exceeding one-tenth part of the original amount to be paid in, unless the Court for special reasons (which it shall record) thinks fit to require a larger additional amount.

(b) Thereupon the Court may, if it thinks fit, and after notice to the incumbrance, unless the Court, for reasons to be recorded in writing, thinks fit to dispense with such notice, declare the property to be freed from the incumbrance, and make any order for conveyance, or vesting order,  proper for giving effect to the sale, and give directions for the retention and investment of the money in Court.

(c) After notice served on the persons interested in or entitled to the money or fund in Court the Court may direct payment or transfer thereof to the persons entitled to receive or give a discharge for the same, and generally may give directions respecting the application or distribution of the capital or income thereof.

(d) An appeal shall lie from any declaration, order or direction under this section as if the same were a decree.

(e) In this section “Court” means (1) a High Court in the exercise of its ordinary or extraordinary original civil jurisdiction, (2) the Court of a District Judge within the local limits of whose jurisdiction the property or any part thereof is situate, (3) any other Court which the State Government may, from time to time, by notification in the Official Gazette, declare to be competent to exercise the jurisdiction conferred by this section.

धारा 57 Transfer of property Act 

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम  

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