धारा 3 सम्पत्ति अन्तरण | Section 3 of Transfer of property Act Hindi

आज के इस आर्टिकल में मै आपको “ निर्वचन खंड | सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 3 क्या है | Section 3 Transfer of property Act in hindi | Section 3 of Transfer of property Act | धारा 3 सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम | Interpretation-clause के विषय में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा । तो चलिए जानते है की –

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 3 |  Section 3 of Transfer of property Act | Section 3 Transfer of property Act in Hindi

[ Transfer of property Act Section 3 in Hindi ] –

निर्वचन खंड-

इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,

“स्थावर संपत्ति” के अन्तर्गत खड़ा काष्ठ, उगती फसलें या घास नहीं आती;

“लिखत से अवसीयती लिखत अभिप्रेत है;

किसी लिखत के सम्बन्ध में “अनुप्रमाणित” से ऐसे दो या अधिक साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित अभिप्रेत है और सर्वदा अभिप्रेत रहा होना समझा जाएगा जिनमें से हर एक ने निष्पादक को लिखत पर हस्ताक्षर करते या अपना चिह्न लगाते देखा है या निष्पादक की उपस्थिति में और उसके निदेश द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को लिखत पर हस्ताक्षर करते देखा है, या निष्पादक से उसके अपने हस्ताक्षर या चिह्न की या ऐसे अन्य व्यक्ति के हस्ताक्षर की वैयक्तिक अभिस्वीकृति पाई है, और जिनमें से हर एक ने निष्पादक की उपस्थिति में लिखत पर हस्ताक्षर किए हैं, किन्तु यह आवश्यक न होगा कि ऐसे साक्षियों में से एक से अधिक एक ही समय उपस्थित रहे हों और अनुप्रमाणन का कोई विशिष्ट प्ररूप आवश्यक न होगा;]

“रजिस्ट्रीकृत से ऐसे किन्हीं राज्यक्षेत्रों के], जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, किसी भी भाग में,] दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण को विनियमित करने वाली तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिप्रेत है;

“भूबद्ध” से अभिप्रेत है

(क) भूमि में मूलित, जैसे पेड़ और झाड़ियां ;

(ख) भूमि में निविष्ट, जैसे भित्तियां या निर्माण ; अथवा

(ग) ऐसी निविष्ट वस्तु से इसलिए बद्ध कि जिससे यह बद्ध है उसका स्थायी फायदाप्रद उपभोग किया जा सके ;

“अनुयोज्य दावे” से स्थावर सम्पत्ति के बन्धक द्वारा या जंगम सम्पत्ति के आडमान या गिरवी द्वारा प्रतिभूत ऋण से भिन्न किसी ऋण का या उस जंगम सम्पत्ति में, जो दावेदार के वास्तविक या आन्वयिक कब्जे में नहीं है फायदाप्रद हित का ऐसा दावा अभिप्रेत है, जिसे सिविल न्यायालय अनुतोष देने के लिए आधार प्रदान करने वाला मानता हो चाहे ऐसा ऋण या फायदाप्रद हित वर्तमान, प्रोद्भवमान, सशर्त या समाश्रित हो;

किसी तथ्य की किसी व्यक्ति को सूचना है यह तब कहा जाता है, जब वह वास्तव में उस तथ्य को जानता है, अथवा यदि ऐसी जांच या तलाश, जो उसे करनी चाहिए थी, करने से जानबूझकर प्रविरत न रहता या घोर उपेक्षा न करता, तो वह उस तथ्य को जान लेता।

स्पष्टीकरण 1-जहां कि स्थावर सम्पत्ति से सम्बन्धित कोई संत्र्यवहार रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित है, और वह रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है वहां यह समझा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति को, जो ऐसी सम्पत्ति को या ऐसी सम्पत्ति के किसी भाग या ऐसी सम्पत्ति में किसी अंश या हित को अर्जित करता है, ऐसी लिखत की सूचना उस तारीख से है, जिस तारीख को रजिस्ट्रीकरण हुआ है, या जहां कि एक ही उपजिले में सब सम्पत्ति स्थित नहीं है या जहां कि रजिस्ट्रीकृत लिखत भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) की धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत की गई है, वहां उस पूर्वतम तारीख से है, जिसको ऐसे रजिस्ट्रीकृत लिखत का कोई ज्ञापन उस उपरजिस्ट्रार के पास फाइल किया गया है जिसके उपजिले में उस सम्पत्ति को, जो अर्जित की जा रही है या उस सम्पत्ति का, जिसमें अंश या हित अर्जित किया जा रहा है, कोई भाग स्थित है ] : परन्तु यह तब जबकि

(1) उस लिखत का रजिस्ट्रीकरण और उसके रजिस्ट्रीकरण की पूर्ति भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) द्वारा और तद्धीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित रीति से की जा चुकी हो;

(2) लिखत गया ज्ञापन] को उन पुस्तकों में, यथास्थिति, सम्यक् रूप से प्रविष्ट या फाइल कर दिया गया हो जो उस अधिनियम की धारा 51 के अधीन रखी जाती हैं ; तथा

(3) उस संत्र्यवहार के बारे में, जिससे वह लिखत सम्बन्धित है, विशिष्टियां उन अनुक्रमणिकाओं में ठीक-ठीक प्रविष्ट कर दी गई हों, जो उस अधिनियम की धारा 55 के अधीन रखी जाती हैं।

स्पष्टीकरण 2–जो व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को या किसी ऐसी सम्पत्ति में के किसी अंश या हित को अर्जित करता है, यह समझा जाएगा कि उसे उस सम्पत्ति में उस व्यक्ति के हक की, यदि कोई हो, सूचना है, जिसका तत्समय उस पर वास्तविक कब्जा है।

स्पष्टीकरण 3–यदि किसी व्यक्ति के अभिकर्ता को किसी तथ्य की उस कारवार के अनुक्रम में, जिसके लिए वह तथ्य तात्त्विक है, उस व्यक्ति की ओर से कार्य करते हुए सूचना मिल जाती है तो यह समझा जाएगा कि उस तथ्य की सूचना उस व्यक्ति को थी:

परन्तु यदि अभिकर्ता कपटपूर्वक तथ्य को छिपा लेता है तो जहां तक कि उस व्यक्ति का सम्बन्ध है, जो उस कपट में पक्षकार था या अन्यथा उसका संज्ञान रखता था, उसकी सूचना मालिक पर आरोपित न की जाएगी।]

धारा 3 Transfer of property Act

[ Transfer of property Act Section 3 in English ] –

  Interpretation-clause ”–

In this Act, unless there is something repugnant in the subject or context,— “immoveable property” does not include standing timber, growing crops or grass; “instrument”, 

means a non-testamentary instrument; 

5[“attested”, in relation to an instrument, means and shall be deemed always to have meant attested by two or more witnesses each of whom has seen the executant sign or affix his mark to the instrument, or has seen some other person sign the instrument in the presence and by the direction of the executant, or has received from the executant a personal acknowledgement of his signature or mark, or of the signature of such other person, and each of whom has signed the instrument in the presence of the executant; but it shall not be necessary that more than one of such witnesses shall have been present at the same time, and no particular form of attestation shall be necessary;] 

“registered” means registered in 6[7[any part of the territories] to which this Act extends] under the laws8 for the time being in force regulating the registration of documents; 

“attached to the earth” means— 

(a) rooted in the earth, as in the case of trees and shrubs; 

(b) imbedded in the earth, as in the case of walls or buildings; or 

(c) attached to what is so imbedded for the permanent beneficial enjoyment of that to which it is attached; 9[“actionable claim” means a claim to any debt, other than a debt secured by mortgage of 

immoveable property or by hypothecation or pledge of moveable property, or to any beneficial interest in moveable property not in the possession, either actual or constructive, of the claimant, which the Civil Courts recognise as affording grounds for relief, whether such debt or beneficial interest be existent, accuring, conditional or contingent;] 

1[“a person is said to have notice”] of a fact when he actually knows that fact, or when, but for wilful abstention from an enquiry or search which he ought to have made, or gross negligence, he would have known it. 

Explanation 1.—Whereany transaction relating to immovable property is required by law to be and has been effected by a registered instrument, any person acquiring such property or any part of, or share or interest in, such property shall be deemed to have notice of such instrument as from the date of registration or, 2[where the property is not all situated in one sub-district, or where the registered instrument has been registered under sub-section (2) of section 30 of the Indian Registration Act, 1908 (16 of 1908), from the earliest date on which any memorandum of such registered instrument has been filed by any Sub-Registrar within whose sub-district any part of the property which is being acquired, or of the property wherein a share or interest is being acquired, is situated]: 

Provided that— 

(1) the instrument has been registered and its registration completed in the manner prescribed by the Indian. Registration Act, 1908 (16 of 1908) and the rules made thereunder, 

(2) the instrument 3[or memorandum] has been duly entered or filed, as the case may be, in books kept under section 51 of that Act, and 

(3) the particulars regarding the transaction to which the instrument relates have been correctly entered in the indexes kept under section 55 of that Act. 

Explanation II.—Any person acquiring any immoveable property or any share or interest in any such property shall be deemed to have notice of the title, if any, of any person who is for the time being in actual possession thereof. 

Explanation III.—A person shall be deemed to have had notice of any fact if his agent acquires notice thereof whilst acting on his behalf in the course of business to which that fact is material: 

Provided that, if the agent fraudulently conceals the fact, the principal shall not be charged with notice thereof as against any person who was a party to or otherwise cognizant of the fraud.

धारा 3 Transfer of property Act 

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम  

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Updated: May 21, 2020 — 7:45 pm

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