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K R Narayanan Biography | कोचेरिल रमण नारायण की जीवनी

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K R Narayanan Biography

K R Narayanan Biography | कोचेरिल रमण नारायण की जीवनी

K R Narayanan Biography

K R Narayanan Biography

कोचेरिल रमण नारायण भारत के दसवे राष्ट्रपति थे।1992 में उनकी नियुक्ती देश के नौवे उपराष्ट्रपति के रूप में की गयी, फिर 1997 में नारायण देश के राष्ट्रपति बने थे। दलित समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाले वे पहले और एकमात्र राजनेता थे।

नारायण एक स्वतंत्र और मुखर राष्ट्रपति के नाम से प्रसिद्ध थे, जिन्होंने अपने कार्यो की बहुत सी मिसाल स्थापित कर रखी थी।

वे खुद को “कार्यकारी राष्ट्रपति” बताते थे जो “संविधान के चारो कोनो में काम करते थे”, उन्होंने “कार्यकारी राष्ट्रपति” जिनके पास पूरी ताकत होती है और “रबर स्टैम्प राष्ट्रपति” जो बिना की प्रश्न और विरोध के सरकार के निर्णयों का समर्थन करते थे, इन दोनों के बीच का रास्ता चुना।

वे अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग राष्ट्रपति के रूप में करते थे, पने निर्णयों से उन्होंने देश के राजनीतिक इतिहास में बहुत सी मिसाले कायम की है.

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के आर नारायण का प्रारंभिक जीवन 

के. आर. नारायण का जन्म उज्हवूर के पेरुमथानम में एक छोटी सी फूस की झोपडी में कोचेरिल रमण विद्यार के सात बच्चो में से चौथे बच्चे के रूप में हुआ था, वे सिद्धा और आयुर्वेद की पारंपरिक भारतीय औषधि प्रणाली के व्यवसायी थे।

उनका परिवार काफी गरीब था, लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में उनके पिता कुशाग्र बुद्धि के होने की वजह से उनका बहुत सम्मान किया जाता था।

4 फरवरी 1921 में उनका जन्म हुआ था लेकिन उनके अंकल को उनके वास्तविक जन्मतिथि के बारे में नही पता और इसीलिए मनमाने ढंग से उनका जन्म 27 अक्टूबर 1920 को ही माना गया, नारायण ने भी इसी जन्म तारीख को अधिकारिक रखने का निर्णय लिया था।

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के आर नारायण के पिता ने भारतीय पद्धति की चिकित्सा सिद्धा व आयुर्वेद का गहराई से अध्यन किया था, उन्हें इसकी अच्छी समझ थी, जिसकी वजह से सभी  उनका बहुत सम्मान करते थे.

K.R. Narayanan सात भाई बहिन थे और वे चोथे नंबर के थे. इनकी एक बड़ी बहिन गौरी होमियोपैथी थी. गरीब होने के बावजूद इनके पिता ने शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी.

के आर नारायण की प्रारंभिक शिक्षा 1927 में उझावूर के अवर प्राथमिक विद्यालय में हुई थी. उस समय आने जाने का उचित साधन नहीं होता था, जिस वजह से शिक्षा के लिए उन्हें  रोज 15 km  पैदल जाना पड़ता था.

के आर नारायण  जी के पिता के पास इतनी राशि भी नहीं होती थी कि वे अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला के लिए शिक्षा शुल्क दे सके,  जिस वजह से बालक नारायण को हमेशा अपनी क्लास के बाहर खड़े हो कर ही  शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती थी.

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के आर नारायण जी के पास किताबें खरदीने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, वे अपने दोस्तों से किताबें ले कर नक़ल कर लेते थे. 1931 – 1935 तक, के आर नारायण ने आवर लेडी ऑफ़ लौरदे स्कूल से शिक्षा प्राप्त की.

 

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सन 1937 में के आर नारायण  जी ने सेंट मेर्री हाई स्कूल से  मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की.  स्कॉलरशिप की मदद से के आर नारायण जी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा कोट्टायम के सी. एम. एस. स्कूल से 1940 में पूरी की.

1943 में उन्होंने B.A एवं M.A English literature में त्रावणकोर विश्वविद्यालय से किया. वे पहले ऐसे दलित हे जिन्होंने फर्स्ट क्लास में अपनी डिग्री पूरी की.

1944-45 में Narayanan जी ने the Hindu and the times of india में पत्रकार के रूप में कार्य किया| इस दौरान 10 अप्रैल 1945 में उन्होंने गांधीजी का interview भी लिया था|

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K.R. Narayanan जी को हमेशा से विदेश जा कर पढाई करने का मन था किन्तु उनकी आर्थिक स्थिति उसकी इजाजत नहीं देती थी| scholarship का भी उस समय प्राबधान नहीं था, सो Narayanan जी ने JRD tata को एक चिठ्ठी लिख कर मदद मांगी|

Tata ने उनकी मदद की और वे political science की शिक्षा के लिए london school of iconomics चले गए| 1948 में वे भारत लौट आए और उनके प्रोफेसर Laski ने उन्हें नेहरूजी से मिलवाया|

नेहरूजी ने उन्हें IFS की job दिलवाई फिर K.R. Narayanan जी 1949 में Burma चले गए| इस दौरान 1954 में Delhi school of economics में उन्होंने बच्चों को शिक्षा भी दी|

1978 में IFS के रूप में जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ उसके बाद वे 1979 से 80 तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में उपकुलपति रहे| इसके बाद 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी ने Indian ambassador america के लिए 1980 से 84 तक बना दिया|

इंदिरा गांधी की प्रार्थना पर ही नारायण ने राजनीती में प्रवेश किया था और 1984, 1989 और 1991 में केरला के पलक्कड़ की ओट्टापलम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए कांग्रेस की सीट से लगातार तीन जनरल चुनाव जीते।

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साथ ही वे राजीव गाँधी की यूनियन कैबिनेट में राज्य के मिनिस्टर भी थे, जिन्होंने योजना (1985), एक्सटर्नल अफेयर (1985-86) और विज्ञान और तंत्रज्ञान (1986-89) जैसे विभाग में उन्होंने काम किया था।

संसद के सदस्य के रूप में , भारत में पेटेंट कण्ट्रोल पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव का उन्होंने विरोध किया था। लेकिन फिर 1991 में जब कांग्रेस के हातो में ताकत आयी थी तब नारायण को कैबिनेट में शामिल नही किया गया।

केरला के कांग्रेस मुख्यमंत्री के. करुणाकरण उनके राजनीतिक सलाहकार ने उन्हें मिनिस्टर ना बनाने की वजह को बताते हुए उन्होंने नारायण को “कम्युनिस्ट साथी यात्री” बताया।

इसके बाद 21 अगस्त 1992 को शंकर दयाल शर्मा के राष्ट्रपति काल में उनकी नियुक्ती भारत के उप-राष्ट्रपति के रूप में की गयी। उनके नाम की सिफारिश भूतपूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल ले लीडर व्ही.पी. सिंह ने की थी।

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बाद में पी.व्ही नरसिम्हा राव की सहायता से बिना कीसी विरोध के उन्हें चुना गया था। लेकिन फिर बाद में नारायण और नरसिम्हा राव के रिश्तो की बाद करते हुए यह पता चला की उनमे कोई कम्युनिस्ट अंतर नही बल्कि वैचारिक अंतर था, लेकिन फिर भी नरसिम्हा उन्हें उपराष्ट्रपति बनने के लिए सहायता रहे, और बाद में राष्ट्रपति पद के लिए भी नरसिम्हा ने नारायण की काफी सहायता की थी।

नरसिम्हा की सहायता से नारायण को काफी फायदा हुआ था, और बाद में सभी राजनेताओ ने उपराष्ट्रपति के रूप में उन्हें स्वीकारा था।

नारयणन जब प्रेसिडेंट बने उस समय इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे, लेकिन कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के कारण 19 मार्च, 1998 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा।

इन परिस्थितियों को उन्होंने बड़े ही सहजता से हैंडल किया। चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने कभी भी आंख मूंदकर किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं किया।

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एक बार केंद्र सरकार ने उनके पास उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा का प्रस्ताव सरकार के पास फिर से विचार के लिए रिटर्न कर दिया। ऐसा करने वाले वे पहले प्रेसिडेंट थे।

राष्ट्रपति रहने के दौरान आम चुनाव में अपनी पत्नी के साथ लाइन में खड़े होकर मतदान किया और ऐसा करने वाले वे पहले राष्ट्रपति थे। नौकरशाही से मंत्री और फिर उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति के पद पर रहने के दौरान उन्होंने मानवीय मूल्यों को हमेशा बनाए रखा।

आदिवासी, अल्पसंख्यकों और समाज के कमजोर लोगों की आवाज उठाने के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे। 25 जुलाई 2002 को राष्ट्रपति के पद से रिटायर होने के बाद वे अपनी पत्नी उषा नारायणन के साथ दिल्ली के पृथ्वीराज रोड पर रहने लगे थे।

राष्ट्रपति नियुक्त होने के बाद नारायणन ने एक नीति अथवा सिद्धान्त बना लिया था कि वह किसी भी पूजा स्थान या इबादतग़ाह पर नहीं जाएँगे-चाहे वह देवता का हो या देवी का। यह एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने अपने कार्यकाल में किसी भी पूजा स्थल का दौरा नहीं किया।

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राष्ट्रपति के रूप में जब श्री नारायणन की पदावधि के अवसान का समय निकट आया तो विभिन्न जनसमुदायों की राय थी कि इन्हें दूसरे सत्र के लिए भी राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए।

इस समय एन. डी. ए. के पास अपर्याप्त बहुमत था। लेकिन नारायणन ने स्पष्ट कर दिया कि वह सर्वसम्मति के आधार पर ही पुन: राष्ट्रपति बनना स्वीकार करेंगे। उस समय की विपक्षी पार्टियों- कांग्रेस, जनता दल, वाम मोर्चा तथा अन्य ने भी इनको दूसरी बार राष्ट्रपति बनाये जाने का समर्थन किया था।

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति श्री नारायणन से मुलाक़ात करके यह प्रार्थना की कि वह अगले सत्र हेतु भी राष्ट्रपति बनें। लेकिन वाजपेयी ने इनसे भेंट करके यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर एन. डी. ए. में असहमति है।

श्री के. आर. नारायणन ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें ‘इण्डिया एण्ड अमेरिका एस्सेस इन अंडरस्टैडिंग’, ‘इमेजेस एण्ड इनसाइट्स’ और ‘नॉन अलाइमेंट इन कन्टैम्परेरी इंटरनेशनल निलेशंस’ उल्लेखनीय हैं। इन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कई पुरस्कार प्राप्त हुए थे।

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1998 में इन्हें ‘द अपील ऑफ़ कॉनसाइंस फ़ाउंडेशन’, न्यूयार्क द्वारा ‘वर्ल्ड स्टेट्समैन अवार्ड’ दिया गया। ‘टोलेडो विश्वविद्यालय’, अमेरिका ने इन्हें ‘डॉक्टर ऑफ़ साइंस’ की तथा ‘आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय’ ने ‘डॉक्टर ऑफ़ लॉस’ की उपाधि दी।

इसी प्रकार से राजनीति विज्ञान में इन्हें डॉक्टरेट की उपाधि तुर्की और सेन कार्लोस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई। भारत माता के इस सच्चे सपूत को सदैव याद किया जाएगा जो राष्ट्रपति से ज़्यादा एक बेहतर इंसान थे।

के आर नारायण की मृत्यू 

जीवन के अंतिम दिनों में निमोनिया से पीड़ित हो गए थे। इलाज के लिए उन्हें आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, नई दिल्ली मं भर्ती किया गया था जहां 9 नवंबर, 2005 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 24 जनवरी 2008 को इनकी पत्नी उषा नारायणन का भी निधन हो गया।

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