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उपनिधान उपनिहिती और उपनिधाता | Bailment

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उपनिधान उपनिहिती और उपनिधाता | Bailment

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उपनिधान भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 148 के अनुसार = उपनिधान एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिए इस संविदा पर माल का परिदान करना है कि जब वह प्रयोजन पूरा हो जाये तब वह माल लौटा दिया जायेगा या उसे परिदान करने वाले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार अन्यथा व्यनित कर दिया जायेगा।

उपनिधान के तत्व

1 – कब्जे का परिदान– उपनिधान के लिये आवश्यक है कि कब्जे का परिदीन कर दिया गया हो कब्जे के परिदान के बिना कोई संव्यवहार उपनिधान नहीं हो सकता।

2 – विशिष्ट उद्देश्य अथवा प्रयोजन– उपनिधान में किसी वस्तु का कब्जा किसी विशिष्ट उद्देश्य अथवा प्रयोजन से किया जाता है यह आवश्यक नहीं है कि उपनिहिति ऐसी वस्तु का उपयोग करे ही।

3 – युक्तियुक्त समय में वापस लौटाने की शर्त– उपनिहित वस्तु को युक्तियुक्त समयं या बताये गये समय में वापस उपनिधाता को लौटाने की शर्त पर प्रदान किया जाता है।

उपनिधान में दो पक्षकार होते हैं

जो व्यक्ति माल का परिदान करता है उसे उपनिधाता और जिसे माल का परिदान किया जाता हैं उसे उपनिहिति कहते है।

उपनिधान निम्न प्रकार से किया जा सकता है

(i) निक्षेप द्वारा (By Deposite)- जैसे बैंक के लाकर में वस्तु जमा करना

(ii) अवक्रय (By Hire)- जैसे वस्तु को भाड़े पर देना

(iii) गिरवी (Pledge)-जैसे वस्तु को ऋण या वर्चन के बदले देना

(iv) माँगना (By Commodatum)- जैसे मित्र द्वारा उधार मांग कर ले जाना

(v) वाहक (By carriar)- जैसे वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिये देना .

उपनिधाता के कर्त्तव्य

1 – माल की त्रुटियों को प्रकट करने का कर्तव्य (धारा-150)

(i) निःशुल्क उपनिधान की दशा में-उपनिधान ऐसी त्रुटियों को प्रकट करने को आबद्ध है , जो –

(a) उपनिधाता की जानकारी में हो, एवं

(b) जो उनके उपयोग में सारभूत रूप से विघ्न डालती हो या उपनिहिति को साधारण जोखिम में डालती हो।

(ii)  भाड़े पर उपनिधान की दशा में- उपनिधाता उपनिहित माल की त्रुटियों से उपनिहिति को कारित क्षति के लिये उत्तरदायी होगा चाहे ऐसी त्रुटियों से उपनिधाता परिचित रहा हो या नहीं।

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2 – आवश्यक व्ययों का प्रतिसंदाय करने का कर्त्तव्य – उपनिधाता उन सभी व्ययों को जो उपनिहिती द्वारा उपनिधान के लिए उपगत किये गये हों, देने के लिए उत्तरदायी है, लेकिन आवश्यक यह है कि –

(i) उपनिहिति द्वारा उपनिधाता के लिये माल रखा गया हो या माल का प्रवहण किया गया हो या माल पर कोई काम करवाया गया हो।

(ii)) उपनिहिति को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया गया हो। (धारा-158)

3 – उपनिहिति को कारित हानि की प्रतिपूर्ति करने का दायित्व– उपनिधाता, उपनिहिति को कारित ऐसी किसी भी प्रकार की हानि के लिए उत्तरदायी होता है जो उपनिहिति निम्नांकित कारणों से उठाता है-

(i) उपनिधाता, उपनिधान करने का हकदार नहीं था।

(ii) उपनिधाता माल को वापस लेने का हकदार नहीं था।

(iii) उपनिधाता को उपनिधान के संबंध में निर्देश देने का कोई हक नहीं था। (धारा-164)

उपनिधाता के अधिकार

1 -उपनिधान को पर्यवसान करने का अधिकार (धारा-153)

2 – मिश्रित माल में हित धारण करने का अधिकार– यदि उपनिहिति उपनिधाता की       सम्मति से उपनिहित माल को अपने माल में मिश्रित करता है तो मिश्रित माल में उपनिधाता एवं उपनिहिती का अपने-अपने अंश के अनुपात में हित होगा। (धारा-155)

3 – उपनिहिति से प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार– धारा 156 में उपनिधाता के प्रतिकर सम्बन्धी अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार –

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(i) ” जब उपनिहिति अपने माल में उपनिधाता के माल को उसकी बिना सहमति मिला देता है तो उपनिधाता अपने माल को उपनिहिति के माल से अलग करा लेता है एवं ऐसे पृथक्करण में हुये व्यय को प्राप्त कर सकता है एवं ऐसे मिश्रण से हुये नुकसान की वसूली के लिए दावा कर सकता है। (धारा-156)

(ii) यदि उपनिधाता का माल उपनिहिति के माल से अलग नहीं किया जा सकता है तो  उपनिधाता अपने माल की हानि के लिये उपनिहिति से प्रतिकर प्राप्त करने का हकदार होगा। (धारा-157)

4 – माल को वापस प्राप्त करने का अधिकार– यदि कोई चीज आनुग्रुहिक रूप से उपयोग हेतु उधार दी गई है तो उपनिधाता किसी भी समय वापस प्राप्त करने की अपेक्षा कर सकेगा चाहे वह एक विनिर्दिष्ट समय या प्रयोजन के लिये ही उधार क्यों न दी गई हो। परंतु यदि विनिर्दिष्ट समय से पूर्व वापसी के कारण होने वाले लाभ से हानि अधिक हो तो वह उधार देने वाले से उस मात्रा तक क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी होगा। (धारा-159)

5 – उपनिहित माल में हुई वृद्धि या उससे हुये लाभ को प्राप्त करने का अधिकार (धारा -163)

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6 – दोषकर्ता के विरूद्ध वाद लाने का अधिकार- उपनिधाता को यह अधिकार है कि वह दोषकर्ता के विरूद्ध वाद ला सकेगा यदि –

(i) दोषकर्ता उपनिहित माल के उपयोग से उपनिहिति को दोषपूर्वक वंचित करे।

(ii) उपनिहित माल के कब्जे से दोषपूर्वक वंचित करे।

(iii) उपनिहित माल को कोई क्षति कारित करे। (धारा-180)

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